दुर्लभ प्रजाति के शूकर हिरण : Indian Hog Deer

Dr. Mulla Adam Ali
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Hog Deer and it's species in Hindi by Dr. Parshuram Shukla, Wildlife in India, Bharatiya Vanya Jeev Indian Hog Deer.

Hog Deer : Indian Wildlife

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Wildlife of India : सूकर-मृग (Hog Deer) के मृगशृंग कभी पूरे नहीं गिरते, बल्कि इनके ऊपर का कुछ भाग ही गिरता है। सामान्यतया इसके मृगशृंग अप्रैल के महीने में गिर जाते हैं और फिर अगस्त में पुनः निकलना आरम्भ होते हैं तथा सितम्बर-अक्टूबर तक पूरे निकल आते हैं। यही इसका समागम-काल होता है।

Indian Hog Deer

सूकर-मृग

विश्व में एक ऐसा भी हिरन पाया जाता है जो देखने में सूअर के समान मालूम पड़ता है। यह केवल देखने में ही सूअर जैसा नहीं लगता, बल्कि इसकी चाल भी सूअर के समान बड़ी भद्दी होती है। सामान्यतया हिरन बड़े सुन्दर ढंग से सर ऊपर उठा कर चौकड़ी भरते हुए तेज गति से भागते हैं, किन्तु सूकर-मृग की चाल हिरनों से पूरी तरह अलग होती है। यह छोटी-छोटी घास वाले मैदानों में सुअर के समान मुंह नीचा करके बिना चौकड़ी भरे भागता है। इसलिये इसे सूकर-मृग (Hog Deer) कहते हैं।

सूकर-मृग दक्षिणी एशिया का हिरन है। विश्व में इसकी केवल दो जातियां पायी जाती हैं। पहला भारतीय सूकर-मृग है। यह भारतीय उप महाद्वीप में केवल ब्रह्मपुत्र और गंगा के तराई वाले घास के मैदानों में पश्चिम में सिन्धु से लेकर पूर्व में असम और बर्मा तक पाया जाता है। इसकी एक उपजाति श्रीलंका में भी देखने को मिलती है। दूसरा थाईलैण्ड का सूकर-मृग है। यह थाईलैण्ड के साथ ही वियतनाम में भी पाया जाता है। सूकर-मृग के दो निकट सम्बन्धी हिरन भी हैं जो इन्डोनेशिया और फिलीपाइन्स के कुछ द्वीपों पर रहते हैं। इनकी वर्तमान स्थिति अच्छी नहीं है। इन्हें बचाने के लिये यदि शीघ्र ही कोई प्रभावशाली कदम नहीं उठाये गये तो निश्चित रूप से ये समाप्त हो जायेंगे।

भारत में सूकर-मृग हिमालय के तराई वाले भागों के एक बहुत ही छोटे और सीमित क्षेत्र में देखने को मिलता है। यह उत्तर प्रदेश, पंजाब, हिमांचल प्रदेश तथा असम के तराई वाले घास के मैदानों में पाया जाता है। सूकर-मृग अपना निवास नदियों के किनारे के जंगलों, घास वाले डेल्टा प्रदेशों, छोटे-छोटे टापुओं, खुले मैदानों तथा कम लम्बी - घास वाले समतल मैदानों में बनाता है। सिन्धु में यह झाड़ियों वाले मैदानों में रहता है। इसे कुछ स्थानों पर पाड़ा तथा कुछ स्थानों पर लगुना के नाम से भी जाना जाता है।

सूकर-मृग प्रायः अकेले अथवा दो या तीन के छोटे-छोटे झुण्ड़ों में रहता है। यह बड़े झुण्ड़ कभी नहीं बनाता। सूकर-मृग साधारण ऊंचाई के घास के मैदानों में रहता है। इसे मैदानों की उपजाऊ मिट्टी वाली जमीन बहुत पसन्द है। यह अधिक ऊंचाई वाले स्थानों, पर्वतीय वनों अथवा घने जंगलों में कभी नहीं जाता, किन्तु कभी-कभी भोजन की खोज में इसे घने जंगलों के भीतर जाते हुए देखा जा सकता है।

सूकर-मृग गंगा और ब्रह्मपुत्र की तराई के बहुत लम्बी घास वाले मैदानों से बचता है, किन्तु कभी-कभी इसे लम्बी घास वाले उन मैदानों में देखा गया है, जहां हाथी, गौर और जंगली भैंसे आदि रहते हैं।

सूकर-मृग एक छोटा हिरन है। यह चीतल का निकट सम्बन्धी है, किन्तु इसका शरीर चीतल के समान सुन्दर और आकर्षक नहीं होता। सूकर-मृग का आकार चीतल से छोटा होता है, किन्तु इसका शरीर चीतल से अधिक गठा हुआ, मजबूत और भारी होता है। इसकी कंधों तक की ऊंचाई 60 सेन्टीमीटर से लेकर 65 सेन्टीमीटर तक तथा शरीर का वजन 36 किलोग्राम से लेकर 45 किलोग्राम तक होता है। अभी तक के सबसे बड़े सूकर मृग का कीर्तिमान बर्मा के एक हिरन का है। इसकी कंधों तक की ऊंचाई 68.5 सेन्टीमीटर तथा वजन 48 किलोग्राम था। सूकर-मृग के शरीर के ऊपरी भाग एवं पीठ आदि का रंग हल्का बादामीपन लिये हुए भूरा कत्थई-सा होता है, जिस पर लाल-पीले रंग की हल्की सी आभा स्पष्ट दिखाई देती है। इसके नीचे का भाग, पेट और दोनों पैरों के मध्य का भाग हल्का पीलापन लिये हुए भूरा एवं कानों के भीतर का और पूंछ के नीचे का भाग सफेद होता है। वृद्धावस्था में नर के शरीर का रंग हमेशा के लिये गहरा हो जाता है और यह गहरे भूरे अथवा कत्थई रंग का दिखायी देने लगता है।

मादा सूकर-मृग के शरीर का रंग नर से हल्का होता है। इसकी पीठ एवं ऊपर की त्वचा पीलापन लिये हुए बादामी या भूरी होती है और पेट एवं शरीर के नीचे का भाग नर के समान, शेष शरीर के रंग से हल्का होता है। नर और मादा दोनों के शरीर की बगलों पर हल्के भूरे या सफेद रंग की चित्तियां होती हैं जो दूर से देखने पर लम्बी धारियों के समान मालूम पड़ती हैं। वास्तव में ये चित्तियां अथवा धारियां इसकी त्वचा पर नहीं होतीं। सूकर-मृग के शरीर के बाल गहरे भूरे या कत्थई रंग के होते हैं, किन्तु कुछ बालों की नोंके हल्के भूरे रंग की या सफेद होती हैं, जो दूर से देखने पर चमकती हैं। इन्हें देख कर ऐसा मालूम होता है कि इसके शरीर पर चित्तियां अथवा धारियां हैं।

सूकर-मृग भी संगाई तथा बारहसिंघा आदि भारतीय हिरनों के समान, मौसम में परिवर्तन होने पर अपने शरीर का रंग बदलता है। इसका शरीर गर्मियों के मौसम में बादामीपन लिये हुए हल्का भूरा-सा हो जाता है तथा सर्दियों में यह पुनः गहरे भूरे अथवा कत्थई रंग का हो जाता है।

सूकर-मृग का शरीर अन्य हिरनों की तुलना में कुछ लम्बा होता है। इसकी पूंछ भी लम्बी होती है, किन्तु इसका मुंह और चारों टांगें शरीर की तुलना में कुछ छोटी दिखायी देती हैं। नर और मादा दोनों के शरीर गठे हुए, पुष्ट, मजबूत एवं आकार की तुलना में भारी होते हैं। नर सूकर-मृग की गर्दन और गले पर बालों की एक अयाल होती है, जो मादा के नहीं होती। इसकी दृष्टि, घ्राण-शक्ति और श्रवण-शक्ति तीनों ही बहुत तेज होती हैं। इन्हीं के सहारे यह हिंसक पशुओं से अपनी रक्षा करता है।

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सूकर-मृग के मृगशृंग (एन्टलर्स) कांकड़ के समान होते हैं। नर सूकर-मृग के सर पर तीन-तीन शाखाओं वाले दो मृगशृंग होते हैं। इसके मृगश्रृंगों का आधार काफी लम्बा, कठोर और मजबूत होता है। सूकर-मृग के दोनों मृगश्रृंगों की पहली प्रमुख शाखा निकलने के बाद ये प्रायः कांकड़ के सींगों के समान ऊपर की ओर सीधे बढ़ते हैं। इसके बाद प्रत्येक मृगशृंग से एक लम्बी और एक छोटी शाखा निकलती है। इनमें भी छोटी शाखा दायीं या बायीं ओर तथा लम्बी शाखा ऊपर की ओर होती है। सूकर-मृग के मृगशृंगों की लम्बाई 30 सेन्टीमीटर से लेकर 40 सेन्टीमीटर तक होती है। बर्मा के सूकर-मृग के मृगशृंग भारतीय सूकर-मृग से लम्बे होते हैं। अभी तक के सबसे लम्बे मृगशृंगों का कीर्तिमान 61 सेन्टीमीटर है और यह बर्मा के सूकर-मृग का है।

सूकर-मृग के मृगशृंग कभी पूरे नहीं गिरते, बल्कि इनके ऊपर का कुछ भाग ही गिरता है। सामान्यतया इसके मृगशृंग अप्रैल के महीने में गिर जाते हैं और फिर अगस्त में पुनः निकलना आरम्भ होते हैं तथा सितम्बर-अक्टूबर तक पूरे निकल आते हैं। यही इसका समागम-काल होता है।

सूकर-मृग का प्रमुख भोजन तराई वाले समतल मैदानों में उगने वाली सामान्य घास है। इसके साथ ही यह अन्य हिरनों के समान विभिन्न प्रकार के फल-फूल, झाड़ियां वृक्षों की कोंपलें, पत्तियां और जंगली वनस्पति आदि भी खाता है। सूकर-मृग अपना निवास नदियों के किनारे अथवा किसी भी पानी के स्रोत के निकट बनाता है तथा सर्दियों में भी प्रतिदिन पानी पीता है। यह गर्मियों में पानी की खोज में कभी-कभी अपने निवास से काफी दूर निकल जाता है, किन्तु रात्रि होने के पूर्व लौट आता है।

सूकर-मृग प्रायः अकेले, जोड़े में अथवा दो या तीन के छोटे-छोटे झुण्ड में रहने वाला हिरन है, किन्तु चरते समय इसके छोटे-छोटे झुण्ड मिल कर एक हो जाते हैं। उत्तर भारत में गंगा और ब्रह्मपुत्र के मैदानी भागों में कभी-कभी 15 से 18 तक के झुण्ड चरते हुए देखने को मिल जाते हैं।

सूकर-मृग प्रातःकाल सूर्योदय होते ही चरना आरम्भ कर देता है और दोपहर तक चरता है। इसके बाद धूप और गर्मी से बचने के लिये लम्बी-लम्बी घासों के मध्य किसी छायादार वृक्ष के नीचे अथवा किसी सुरक्षित स्थान पर विश्राम करता है। सांयकाल में धूप और गर्मी कम होने पर यह पुनः चरना आरम्भ कर देता है और सूर्यास्त तक चरता है। कभी-कभी यह खेतों में भी पहुंच जाता है और फसलों को नुकसान पहुंचाता है। यह सांभर तथा चीतल आदि हिरनों के समान घास भी चरता है तथा वृक्षों की पत्तियां और मुलायम कॉपलें व फल-फूल आदि भी खाता है। सूकर-मृग मूलतः दिवाचर है, अर्थात् यह दिन में चरने वाला हिरन है, किन्तु इसके जीवन की बाधाओं और परिस्थितियों ने इसे निशाचर बना दिया है। अब यह प्रायः दिन के साथ ही रात्रि में भी चरते हुए देखा जा सकता है।

सूकर-मृग चरते समय सदैव सतर्क रहता है तथा आराम करते समय इससे भी अधिक सतर्क रहता है। इसका शरीर शक्तिशाली और फुर्तीला होता है। यह अपने से अधिक बड़े जीवों से अपनी रक्षा करने में सक्षम है, किन्तु फिर भी प्रायः अजगर, तेन्दुआ तथा जंगली कुत्तों का शिकार बन जाता है। एक छोटा जीव होने के कारण शेरनी प्रायः सूकर-मृग का शिकार नहीं करती, किन्तु अपने बच्चों को शिकार का प्रशिक्षण देने के लिये मादा सूकर-मृग का चुनाव करती है। कभी-कभी शेर के छोटे-छोटे दो-तीन बच्चे मिल कर भी इसका शिकार करने में सफल हो जाते हैं।

सूकर-मृग का समागम-काल सितम्बर-अक्टूबर के महीनों में होता है। इसका समागम अन्य हिरनों की अपेक्षा अधिक रोचक और आकर्षक होता है। सूकर-मृग प्रायः जोड़े में रहता है, किन्तु समागम-काल में इसके जोड़े एक स्थान पर एकत्रित हो जाते हैं और एक बड़े झुण्ड का रूप धारण कर लेते हैं। नर सूकर-मृग न तो सांभर और कस्तूरी-मृग के समान सीमाक्षेत्र बनाता है और न ही बारहसिंघा और कांकड़ जैसे शर्मीले हिरनों के समान मादा को एकान्त में ले जाकर समागम करता है। इनमें नर सूकर-मृगों के मध्य नववयस्क एवं समागम की अत्यधिक इच्छा रखने वाली मादा को प्राप्त करने और उस पर एकाधिकार करने की होड़ अवश्य देखी जा सकती है, किन्तु ये मादा को प्राप्त करने के लिये आपस में लड़ते नहीं हैं। नर सूकर-मृग समागम-काल के बाद भी मादाओं के साथ रहता है, किन्तु अपने मृगशृंग गिरने के कुछ समय पहले झुण्ड से अलग हो जाता है। यह केवल कुछ समय के लिये ही एकान्त में रहता है और जैसे ही मृगश्रृंगों का निकलना आरम्भ होता है, वैसे ही यह पुनः आकर झुण्ड में मिल जाता है।

सूकर-मृग के समागम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें कभी-कभी मादा सूकर-मृग नर चीतल के साथ और नर सूकर-मृग मादा चीतल के साथ समागम करते हैं। यह विशेषता अन्य किसी भी भारतीय हिरन में नहीं पायी जाती।

मादा सूकर-मृग का गर्भकाल लगभग आठ महीने का होता है। अर्थात् यह वर्षा के पूर्व अप्रैल-मई के महीनों में एक बच्चे को जन्म देती है, किन्तु इनमें जुड़वां बच्चे भी प्रायः देखने को मिल जाते हैं। जन्म के समय नवजात बच्चे के शरीर पर हल्के भूरे अथवा सफेद रंग की चित्तियां या धारियां होती हैं, जो धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं, किन्तु कुछ हिरनों में ये चित्तियां अथवा धारियां जीवन-भर बनी रहती हैं। सूकर मृगों की त्वचा वर्ष के अधिकांश महीनों में गहरे भूरे, कत्थई रंग की रहती है। गर्मियों में इसका रंग पीलापन लिये हुए हल्का बादामी-सा हो जाता है, अतः गर्मियों में ये चित्तियां और धारियां साफ दिखायी देती हैं।

सूकर-मृग की संख्या पर बदलती हुई प्रकृति और पर्यावरण का सीधा प्रभाव पड़ा है। विशेष रूप से तेन्दुए और मानव की स्थिति में परिवर्तन का । तेन्दुआ जिन स्थानों पर कम हो गया है या समाप्त हो गया है, वहां सूकर-मृग की संख्या बढ़ी है, किन्तु जिन स्थानों पर तेन्दुओं की संख्या बढ़ी है, वहां इसकी संख्या में कमी आयी है। इसी तरह मानव बस्तियों और खेतों के विकास के कारण भी इसकी संख्या घटी है तथा उत्तर प्रदेश और पंजाब के कुछ भागों में तो यह विलुप्ति के कगार पर पहुंच गया है।

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