भारतीय काकड़ : Indian muntjac - Barking Deer

Dr. Mulla Adam Ali
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The Barking Deer and it's species in Hindi by Dr. Parshuram Shukla, Wildlife in India, Bharatiya Vanya Jeev Indian Muntjac.

Barking Deer in India : Indian Wildlife

indian muntjac in hindi

Wildlife of India : भारतीय कांकड़ (Indian Muntjac) की आन्तरिक शारीरिक संरचना में एक ऐसी विलक्षण विशेषता पायी जाती है, जो किसी भी अन्य हिरन में देखने को नहीं मिलती। भारतीय नर कांकड़ (Barking Deer) में 7 और मादा में 6 गुणसूत्र (Chromosomes) होते हैं, जबकि इसी की दूसरी जाति चीनी कांकड़ में नर और मादा के 46 गुणसूत्र होते हैं।

Indian Muntjac

भारतीय कांकड़

कांकड़ विश्व का एक मात्र ऐसा हिरन है जो कुत्ते की तरह भौंकता है। इसीलिये इसे बार्किंग डियर (Barking Deer) अर्थात् भौंकन मृग भी कहते हैं। कांकड़ का अंग्रेजी नाम मुंटजैक (Muntjac) है जो इन्डोनेशियन भाषा के 'मुनकाक' से बना है। कांकड़ एक छोटा हिरन है। यह दक्षिणी और दक्षिणी-पूर्वी एशिया के बहुत बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। यह पश्चिमी भारत से लेकर पूर्व में दक्षिणी-पूर्वी चीन एवं फारमोसा तक और दक्षिण में इन्डोनेशिया तक के भागों में बहुत बड़ी संख्या में देखा जा सकता है। इसकी पांच प्रमुख जातियां तथा सत्रह उपजातियां हैं जो बांग्लादेश, पाकिस्तान, बर्मा, भूटान, फिलीपाइन्स, फारमूसा, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो, भारत, चीन, जापान आदि देशों में पायी जाती हैं। जापानी कांकड़ जापान के सघन पर्वतीय जंगलों में, 1800 मीटर तक के ऊंचाई वाले पर्वतीय वनों में मिलता है, जबकि भारत में काकड़ हिमालय पर्वत के 1500 मीटर से लेकर 2000 मीटर तक की ऊंचाई वाले भागों में देखा जा सकता है। कभी-कभी कांकड़ सिक्किम तथा उत्तर प्रदेश के टेहरी गढ़वाल में इससे भी अधिक ऊंचाई वाले भागों में देखने को मिल जाता है। सभी जातियों के कांकड़ हिरनों के आकार एवं मृगशृंगों की लम्बाई में काफी अन्तर होता है। भारत में मालाबार के जंगलों में पाया जाने वाला कांकड़ सबसे बड़ा होता है, जबकि बर्मा के कांकड़ के मृगशृंग बड़े होते हैं। चीन का कांकड़ सबसे छोटा होता है। इसकी कंधों तक की ऊंचाई 45 सेन्टीमीटर से भी कम होती है। चीन के चेक्यांग प्रांत में एक दुर्लभ जाति का कांकड़ पाया जाता है, जिसके चेहरे पर बाल होते हैं। यह चीन का सबसे बड़ा कांकड़ है। इसकी कंधों तक की ऊंचाई 61 सेन्टीमीटर तक होती है।

सन् 1900 में बेडफोर्ड के ग्यारहवें ड्यूक कुछ भारतीय कांकड़ इंग्लैण्ड ले गये थे। ये कांकड़ बड़े आक्रामक स्वभाव के थे तथा इन्होंने वहां के छोटे कुत्तों को इतना परेशान किया कि ड्यूक की आज्ञा से बहुत से कांकड़ परवा दिये गये। इसके बाद चीन से कांकड़ मंगवाये गये जो छीटे तथा कम आक्रामक थे। अतः सभी ने इन्हें पसन्द किया। इस समय इनकी संख्या 400 से 1000 के मध्य है ये सभी भारतीय और चीनी कांकड़ों की मिश्रित सन्तानें हैं और इंग्लैण्ड के अधिकांश पर्वतीय वनों में फैले हुए हैं।

प्रायः जोड़े में अथवा छोटे-छोटे परिवार-समूहों में पाया जाने वाला कांकड़ पर्वतीय जंगलों का हिरन है तथा भारत के अधिकांश पर्वतीय वनों मैं पाया जाता है। दक्षिण में इसकी संख्या कम है। यह मैदानी क्षेत्रों, शुष्क भागों, डेल्टा प्रदेशों तथा तराई के मैदानों में रहना पसन्द नहीं करता। भारत में कांकड़ की तीन प्रमुख जातियां हैं-उत्तर भारत का कांकड़, दक्षिण भारत का कांकड़ तथा मालाबार का कांकड़ ।

कांकड़ एक छोटा हिरन है। इसका शरीर दुबला-पतला, किन्तु मजबूत और शक्तिशाली होता है। यह कस्तूरी मृग से कुछ बड़ा होता है। कांकड़ के शरीर की कंधों तक की ऊंचाई 45 सेन्टीमीटर से लेकर 75 सेन्टीमीटर तक, लम्बाई 80 से 95 सेन्टीमीटर तक तथा वजन 15 किलोग्राम से 25 किलोग्राम तक होता है। कांकड़ का रंग लाली लिये हुए अखरोट की तरह गहरा बादामी होता है और सर्दियों में अधिक गहरा हो जाता है तथा दूर से देखने पर गहरा भूरा दिखाई देता है। इसके शरीर के नीचे का भाग, मुंह तथा पैर हल्के भूरे रंग के होते हैं एवं गले का ऊपरी भाग, पूंछ व जांघों का भीतरी भाग सफेद होता है। कांकड़ का पूरा शरीर भारी और मजबूत होता है, किन्तु पैर शरीर की तुलना में कुछ छोटे होते हैं। इसके चेहरे पर काले रंग की धारियां होती हैं। कांकड़ के शरीर पर छोटे-छोटे मुलायम और चमकदार बाल होते हैं, जिनसे इसकी त्वचा धूप में चमकती है और बहुत सुन्दर दिखायी देती है। इसी सुन्दरता के कारण इसका शिकार किया जाता है। इसके ऊपर के जबड़े में दोनों तरफ दो पूर्ण विकसित कैनाइन दांत होते हैं जो बहुत तेज, नोकदार, नीचे की ओर मुड़े हुए एवं बाहर की ओर निकले हुए होते हैं। इन्हीं के द्वारा यह शत्रुओं से अपनी रक्षा करता है। कैनाइन दांतों के घाव बड़े घातक होते हैं। यह आदमी द्वारा परेशान करने या पकड़ने का प्रयास करने पर उन पर आक्रमण कर देता है और इन्हीं दांतों से घायल कर देता है। इसकी आंखों के नीचे, दरार के पास दो बड़ी-बड़ी ग्रन्थियां होती हैं तथा इसकी जीभ हिरन प्रजाति के अन्य जीवों की तुलना में अधिक लम्बी होती है। इसकी सहायता से यह अपनी आंखों और चेहरे की सफाई तक कर लेता है।

कांकड़ के मृगशृंग (एन्टलर्स) बड़े विलक्षण होते हैं और सभी हिरनों से अलग होते हैं। इसके छोटे-छोटे दो मृगशृंग होते हैं तथा प्रत्येक मृगशृंग में मात्र एक शाखा होती है। इसके मृगश्रृंगों की लम्बाई 7 सेन्टीमीटर से लेकर 15 सेन्टीमीटर तक होती है। अभी तक के सबसे अधिक लम्बे मृगश्रृंगों का कीर्तिमान 17.8 सेन्टीमीटर बर्मा के कांकड़ का है। कांकड़ के मृगश्रृंगों की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसके सिर पर एक मजबूत, कठोर तथा मोटा आवरण होता है जो त्वचा एवं कठोर बालों से ढंका रहता है। इस आधार की ऊंचाई मृगशृंगों की लम्बाई के बराबर होती है और इसी आधार पर इसके मृगश्रृंग निकलते हैं। इसके मृगशृंगों की दूसरी विशेषता यह है कि ये अन्य हिरनों के मृगश्रृंगों के समान पूरे-पूरे कभी नहीं गिरते, बल्कि इनके ऊपर का कुछ भाग ही मई-जून के महीनों में गिरता है तथा समागम-काल तक पुनः निकल आता है। मादा कांकड़ के मृगश्रृंगों का आधार नहीं होता, बल्कि मृगशृंगों के स्थान पर कठोर बालों का ठूंठ जैसा एक गुच्छा होता है। कांकड़ के मृगशृंगों के आधार के निचले भाग में काले रंग की, उभरी हुई पसलियों जैसी दो रेखाएं होती हैं जो इसके चेहरे पर अंग्रेजी के वी (V) अक्षर का आकार बनाती हुई नाक पर मिलती हैं। इसीलिये इसे पट्टीदार मुख वाला हिरन (Rib Faced Deer) भी कहते हैं।

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भारतीय कांकड़ की आन्तरिक शारीरिक संरचना में एक ऐसी विलक्षण विशेषता पायी जाती है, जो किसी भी अन्य हिरन में देखने को नहीं मिलती। भारतीय नर कांकड़ में 7 और मादा में 6 गुणसूत्र (Chromosomes) होते हैं, जबकि इसी की दूसरी जाति चीनी कांकड़ में नर और मादा के 46 गुणसूत्र होते हैं।

कांकड़ दिवाचर होता है। यह सूर्योदय होते ही भोजन की खोज में निकलता है और सूर्यास्त तक भोजन करता है तथा रात्रि के समय आराम करता है। कभी-कभी इसे सूर्यास्त के कुछ समय बाद अन्धेरा होने तक भोजन करते हुए देखा गया है। कांकड़ का प्रमुख भोजन अपनी जाति के अन्य हिरनों के समान घास-फूस, फल-फूल, छोटी-छोटी झाड़ियां, वृक्षों की पत्तियां तथा विभिन्न प्रकार की जंगली वनस्पतियां आदि हैं। यह अपना भोजन प्राप्त करने के लिये अपनी लम्बी जीभ का विशेष उपयोग करता है। यह पहले जीभ को आगे निकाल कर पत्तियां आदि तोड़ता है और फिर आराम से खाता है।

कांकड़ सदैव जोड़े में या छोटे-छोटे परिवार-समूहों में रहता है। झुण्ड में इसकी संख्या 5-6 से अधिक नहीं होती। कांकड़ घने पर्वतीय जंगलों का हिरन है और खुले पहाड़ी वनों में चरना अधिक पसन्द करता है, किन्तु कभी-कभी यह चरने के लिये कम घने जंगलों अथवा जंगलों से मिले समतल मैदानों तक आ जाता है। कांकड़ पहाड़ी वनों में सांभर द्वारा छोड़ी गयी उन छोटी-छोटी झाड़ियों को आराम से खा लेता है, जहां सांभर नहीं पहुंच पाता। यह समतल मैदानों की घास और पानी में उगने वाली वनस्पतियां, फल-फूल आदि कभी नहीं खाता और इनसे हमेशा दूर रहता है। कांकड़ अन्य हिरनों के समान घास आदि चरने की अपेक्षा छोटे-छोटे पौधों की पत्तियां आदि तोड़ कर खाना अधिक पसन्द करता है।

कांकड़ एक छोटा हिरन है, किन्तु यह बड़ा निडर और साहसी होता है। यह इतना फुर्तीता होता है कि शिकारियों द्वारा घेर लिये जाने पर भी सरलता से पकड़ में नहीं आता और घेरा तोड़ कर भाग निकलता है। कांकड़ को जंगल का प्रहरी कहा जाता है। यह शेर, तेन्दुआ, भेड़िया तथा इसी तरह के हिंसक जीवों पर नजर रखता है और जैसे ही ये शिकार पर निकलते हैं, वैसे ही यह कुत्ते की तरह भौंक कर अपने साथियों और जंगल के अन्य जीवों को सतर्क कर देता है, जिससे हिंसक जीवों को शिकार करने में बड़ी असुविधा होती है। यह सदैव प्रातःकाल सूर्योदय के समय और फिर सांयकाल सूर्यास्त के बाद नियमित रूप से भौंकता है, किन्तु कभी-कभी अन्धेरा होने के बाद रात्रि के समय भी इसे भौंकते हुए देखा गया है। रात्रि के सन्नाटे में इसकी आवाज मीलों दूर तक सुनायी देती है।

कांकड़ की दृष्टि तो साधारण होती है, किन्तु इसकी श्रवण शक्ति और घ्राण शक्ति बड़ी तेज होती है। यह जंगल में हमेशा सतर्क रहता है और धीरे-धीरे चलता है। खतरा निकट होने पर यह अपने पिछले पैरों पर खड़ा हो जाता है और उसी दिशा में देखने लगता है, जिधर से खतरे की आशंका होती है। इसके बाद यह 'भाऊ-भाऊ' की भौंकने वाली आवाज निकालते हुए सुरक्षित दिशा में भागता है। यह बहुत तेज गति से भागता है और भागते समय झाड़ियों आदि में फंसता नहीं हैं। कांकड़ भागते समय भी आधे-आधे मिनट में रुक-रुक कर भौंकने की आवाज निकालता रहता है और लगभग आधे घन्टे तक भौंकता रहता है। अपने छोटे और फुर्तीले शरीर के कारण यह प्रायः हिंसक जीवों के बहुत अधिक निकट आजाने के बाद भी फिसल कर निकल भागने में सफल हो जाता है। आदमियों को देखने पर भी यह सतर्क हो जाता है और पहले दोनों पैरों पर खड़े होकर उन्हें देखता है और फिर तेजी से भाग जाता है। कांकड़ अपना पीछा किये जाने पर थकता नहीं है और सुबह से शाम तक भागता रहता है।

कांकड़ के प्रमुख शत्रु हैं-शेर, तेन्दुआ, लकड़बग्घा, भेड़िया और जंगली कुत्ते। जब यह अकेला होता है तो इन्हें देखने के बाद भाँक कर खतरे की चेतावनी नहीं देता, बल्कि बिना कोई आवाज किये किसी सुरक्षित स्थान पर छिपने का प्रयास करता है। इस समय इसकी गर्दन आगे की तरफ बढ़ी हुई और नीचे झुकी रहती है तथा इस समय यह इसे हिलाता-डुलाता भी नहीं है। कभी-कभी बहुत अधिक डर जाने या घबरा जाने पर यह गले से पतली-सी रंभाने की आवाज निकालता है और दांतों से भी एक विचित्र प्रकार की आवाज उत्पन्न करता है। कांकड़ बड़ा साहसी भी होता है। यह शत्रु के ठीक सामने आ जाने पर जोर-जोर से भौंक कर उसे डराने का प्रयास करता है। इसके साथ ही जमीन पर पैर पटकता है और फिर कुछ कदम पीछे हट कर अपनी सुरक्षा की स्थिति बना कर शत्रु का सामना करने के लिये तैयार हो जाता है। जीव वैज्ञानिकों का मत है कि यह अवसर पड़ने पर तेंदुए का भी सामना कर सकता है, किन्तु इसे अभी तक किसी बड़े हिंसक जीव से लड़ते हुए नहीं देखा गया है। हां! कभी-कभी जंगली कुत्तों द्वारा परेशान किये जाने पर यह उन पर अवश्य आक्रमण कर देता है। बहुत छोटा हिरन होने के कारण शेर और शेरनी प्रायः कांकड़ पर हमला नहीं करते, किन्तु कोई बड़ा शिकार न मिलने पर इसे अपना शिकार बना सकते हैं। इसके साथ ही कभी-कभी शेरनी अपने बच्चों को शिकार करने का प्रशिक्षण देने के लिये शिकार के रूप में कांकड़ का उपयोग करती है।

कांकड़ का समागम बड़ा रोचक और आकर्षक होता है। हिरन प्रजाति के सभी जीवों का समागम इनके मृगश्रृंगों से सम्बद्ध होता है। इनके मृगशृंग जिस मौसम में परिपक्व होते हैं वही इनका समागम-काल होता है। कांकड़ के मृगशृंग पूरे वर्ष-भर गिरते निकलते और परिपक्व होते हैं, अतः इनमें प्रायः वर्ष-भर समागम चलता है तथा पूरे वर्ष बच्चे होते हैं, किन्तु कुछ स्थानों पर इनका समागम एक विशेष समय पर ही देखने को मिलता है। उत्तर भारत के पर्वतीय वनों में पाये जाने वाले कांकड़ का समागम-काल सर्दियों के मौसम में जनवरी-फरवरी के महीनों में होता है। इनके मृगश्रृंग मई-जून में गिर जाते हैं तथा अगस्त-सितम्बर में निकलना आरम्भ होते हैं और जनवरी-फरवरी तक पूर्ण रूप से परिपक्व हो जाते हैं।

कांकड़ समागम-काल में अपने क्षेत्र की सीमा निर्धारित करता है। यह हमेशा जोड़े में रहता है, किन्तु कभी-कभी एक से अधिक मादाओं के साथ भी देखा गया है। कांकड़ एक शर्मीला हिरन है। अतः इसके सीमा क्षेत्र, हरम, मादा-प्राप्ति के लिये होने वाली लड़ाई आदि के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी का अभाव है। जीव वैज्ञानिकों द्वारा एकत्रित की गयी जानकारी के अनुसार समागम-काल में मादा कांकड़ बिल्ली की तरह पतली मिमियाने की सी आवाज निकालती है तथा नर एक विशेष तरीके से भौंकता है। वास्तव में नर और मादा दोनों एक दूसरे को आकर्षित करने के लिये आवाजें निकालते हैं। समागम के लगभग 6 माह बाद मादा कांकड़ एक बच्चे को जन्म देती है, किन्तु कभी-कभी जुड़वां बच्चे भी होते हुए देखे गये हैं। मादा कांकड़ का प्रसव बरसात के पूर्व प्रायः जून-जुलाई के महीनों में होता है। जन्म के समय बच्चे के शरीर पर चित्तियां होती हैं, जो छः माह के भीतर धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं। कांकड़ के बच्चे टी...टी टी की सी आवाज निकालते हैं। यह आवाज एक चौड़ी पत्ती को मुंह में रख कर आसानी से निकाली जा सकती है। मादा कांकड़ अपने बच्चे की सुरक्षा के लिये हमेशा सचेत रहती है और इसका बच्चा आवाज दे या मानव अपने मुंह से इसके बच्चे की तरह आवाज निकाले तो यह तुरन्त सामने आ जाती है। जंगल के हिंसक पशुओं से तो कांकड़ को सदैव खतरा रहता ही है, किन्तु इसकी सबसे बड़ी शत्रु है चील। चील कांकड़ के नवजात बच्चे को अकेला पाकर उठा ले जाती है और अपना आहार बना लेती है।

कांकड़ का बच्चा प्रायः मादा के साथ रहता है। इनमें सामान्य हिरनों के समान बच्चों का पालन-पोषण मादा ही करती है, किन्तु बच्चों की सुरक्षा में नर की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। कांकड़ के बच्चों का विकास सामान्य हिरनों की तरह होता है तथा ये 24 माह से 30 माह की आयु तक वयस्क और प्रजनन के योग्य हो जाते हैं। इनकी आयु 15 वर्ष से 18 वर्ष के मध्य होती है। यद्यपि कांकड़ आक्रामक स्वभाव का होता है फिर भी थोड़ा-सा प्रयास करके इसे पालतू बनाया जा सकता है और चिड़ियाघरों में रखा जा सकता है।

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