पढ़ोगे तो हँसोगे : चटपटे चुटकुले

Dr. Mulla Adam Ali
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Govind Sharma's new book Padhoge to Hansoge (Chatpate Chutkule) Book Review in Hindi, If you read, you will laugh (Jokes) in Hindi, Hindi Pustak Samiksha Himanshu Verma.

Padhoge To Hansoge

padhoge to hansoge book review

पढ़ोगे तो हँसोगे : चटपटे चुटकुले का मतलब है मज़ेदार, मज़ाकिया और तेज़-तर्रार चुटकुले, जिन्हें पढ़कर या सुनकर हँसी रोकना मुश्किल हो जाए। ये चुटकुले आमतौर पर हल्के-फुल्के, चटपटे (यानी तड़केदार) और मनोरंजक होते हैं, जो किसी भी माहौल को खुशनुमा बना सकते हैं। ऐसे ही चुटकुले आपको गोविंद शर्मा जी द्वारा लिखी गई नवीनतम प्रकाशन पढ़ोगे तो हँसोगे में देखने को मिलते है, हिमांशु वर्मा की भूमिका और लेखक की अपनी बात यहां पर दी गई है, पढ़ें-शेयर करें।

पढ़ोगे तो हँसोगे (चटपटे चुटकुले)

जी हाँ, पढ़ोगे तो हँसोगे,

पर यह जरूरी नहीं है। हो सकता है कुछ पढ़कर आप चिंतन-मनन करें। यह भी हो सकता है कि आप तिलमिलाए। कुछ भी हो सकता है। मेरा यही कहना है श्री गोविंद शर्मा की इस पुस्तक की सामग्री के बारे में। मैं श्री गोविंद शर्मा को तब से पढ़ रहा हूँ जब से पढ़ना सीखा है। पहले उनकी लिखी बाल कहानियाँ पढ़ता था। फिर उनके व्यंग्य पढ़ने लगा। उसके बाद तो जैसे लघुकथाओं की बरसात में नहा रहा हूँ।

अब यह एक नई विधा सामने आई है। पहले उनके बनाए चुटकुले, चुटकियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ने के लिए मिलते थे। किसी भी पत्रिका में, दैनिक या साप्ताहिक समाचार पत्र में सबसे पहले मैं वही पढ़ता था। अब तो फेसबुक-व्हाट्सएप की बहार है। इधर उपजा है कोई लतीफा, कुछ ही देर में बहकर आ जाता है। हम उसके हास्यरस में भीग जाते हैं। लेकिन इतिहास और वर्तमान का एक साथ आविर्भाव हो, संगम हो तो उसमें डुबकी लगाने का मनोरंजन-पुण्य अलग ही होता है। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका, कदंबिनी, नंदन, पराग कभी के इतिहास की गलियों में खो गए हैं। उनमें प्रकाशित शर्मा जी के रंग और व्यंग्य अब सामने उपस्थित हुए हैं, तो जो मजा आया है उसे जाहिर करने के लिए शब्द तलाश रहा हूँ।

इस संग्रह में सन 1972 से अब तक शर्मा जी द्वारा रचित मौलिक लतीफे, चुटकुले, कमेंट्स संग्रहीत हैं। इनमें व्यंग्य है, हास्य तो है ही। हमारी दुनिया, घर, परिवार, दफ्तर, दुकान, सड़क, राजनीति का कोई कोना गोविंद शर्मा जी की तीखी और मीठी दृष्टि से वंचित नहीं रहा अर्थात इन सब के बारे में कुछ ना कुछ लिखा है। वह भी मौलिक लिखा है। गजब है! इनमें कुछ तो ऐसे हैं जो पूरे व्यंग्य लेख का चार पंक्तियों में मजा दे देते हैं। कुछ ऐसे भी है जो कम शब्दों की, छोटे आकार की लघुकथा कहला सकती है। पर यह शर्मा जी की उदारता है कि उन्हें लघुकथा न कहकर लतीफा ही बताया है। वैसे भी लघुकथा लेखन के धुरंधर हैं शर्मा जी। रोजाना लिखते हैं और लगभग रोजाना उनकी लघुकथाएँ विभिन्न समाचार-पत्रों में छपती है। लघुकथाओं के उनके पाँच संग्रह तो प्रकाशित हो चुके हैं। यह पाँचों संग्रह, उनकी अन्य कई पुस्तकों की तरह हमारे प्रकाशन संस्थान 'साहित्यागार' से ही प्रकाशित हुए हैं। निसंदेह इस सामग्री (पढ़ोगे तो हँसोगे) को पढ़ना आपका मनोरंजन तो करेगा ही, कुछ सोचने को भी मजबूर कर सकता है। हाँ, आप इन्हें निश्चिंत होकर पढ़ सकते हैं, हँस सकते हैं। दूसरों को सुना सकते हैं, हँसा सकते हैं। निश्चिंत इसलिए कि व्यंग्य या हास्य में मर्यादाओं को पूरा सम्मान दिया गया है। आप माँ-बेटे या पिता-पुत्री एक साथ पढ़ सकते हैं। कहीं भी आपको शर्माना नहीं पड़ेगा, हँसना ही पड़ेगा।

यह सब पढ़कर मैंने विविध लेखन के धनी श्री गोविंद शर्मा जी का मन ही मन अभिनंदन किया है। शुभकामनाएँ दी है। आशा करता हूँ कि भविष्य में ऐसी ही स्तरीय सामग्री हमें पढ़ने-पढ़वाने के लिए मिलती रहेगी।

- हिमांश वर्मा

padhoge to hansoge introduction

अपनी बात

निश्चय ही पढ़ोगे तो हँसोगे। क्योंकि आप बंदर नहीं हैं। बंदर का सुधरा हुआ रूप इन्सान हैं। बंदर खौं खौं कर सकता है, हँस नहीं सकता। पर आप शेर की तरह दहाड़ सकते हैं, ऊँट की तरह बिलबिला सकते हैं, कुत्ते की भौं-भौं कर सकते हैं, साथ ही हँस भी सकते हैं। क्योंकि आप इन्सान है। आपको पढ़ाकर हँसाने के लिये यह पुस्तक अस्तित्व में आई है।

कभी धर्मयुग, सारिका, पराग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी आदि पत्रिकाएँ साहित्य और मनोरंजन की प्रतिनिधि पत्रिकाएँ होती थी। उनके जमाने से मेरी यह चुटकलेबाजी हो रही है। उन पत्रिकाओं में छपते रहे हैं मेरे बनाए लतीफे। दैनिकों के नाम तो क्या गिनाऊँ। आजकल तो इधर चुटकला पैदा हुआ और उधर फेसबुक, व्हाट्सएप पर अवतरित कर दिया जाता है। इसलिये अब भी लतीफा निर्माण जारी है- उद्देश्य सिर्फ आपको हँसाना है। इस संग्रह में कुछ वर्गीकृत है तो ज्यादा बेतरतीब है। लिखे भी इसी तरह है। कोई कभी तो कोई कभी। जिस तरह कहानी, कविता लघुकथा वगैरह के विशेषज्ञ विशारद गुरु होते हैं उस तरह क्या कोई लतीफों का भी है? मुझे नहीं मालूम। पर चाहता हूँ कोई समीक्षक ऐसा हों जो चुटकुलीन ज्ञाता का खिताब धारण कर मेरी इन शरारतों का अध्ययन करे और मुझे फेल-पास के मार्क्स दे।

ये सब आपको हँसाने के लिए हैं, नाराज करने के लिए नहीं। इसलिये मैंने किसी जाति या किसी धर्म का मजाक नहीं बनाया है। हाँ, जिनकी जाति, जिनका धर्म राजनीति है, उन्हें नहीं छोड़ा। उन्हें छोड़ देता तो अपराधी होता।

आपको हँसाने के लिये अश्लीलता का भी सहारा नहीं लिया है। ससुर-बहू, पिता-पुत्री, बहन-भाई सब एक साथ बैठकर पढ़ सकते हैं, हँस सकते हैं।

खैर, यह अब तक की कमाई है। आगे भी होगी- पढ़ने और हँसने के लिये तैयार रहें।

जयपुर के प्रतिष्ठित प्रकाशन गृह 'साहित्यागार' के संस्थापक स्वर्गीय श्री रमेशचन्द वर्मा ने एक परंपरा स्थापित की थी कि मेरी किसी भी विधा की पांडुलिपि उनके पास पहुँचती तो अवश्य ही प्रकाशित होती। उसी का अनुसरण कर रहे हैं श्री हिमांशु वर्मा। आभार।

- गोविन्द शर्मा

ये भी पढ़ें; गोविंद शर्मा जी का नवीनतम प्रकाशन 'पढ़ोगे तो हंसोगे' की समीक्षा

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