नई पुस्तक आई है : 'देखो, मस्त मदारी आया'
इसकी भूमिका के बहाने कवि वीरेंद्र कुमार भारद्वाज जी की बाल साहित्य में अगवानी का मैंने मुक्त कंठ से स्वागत किया है।
आप भी भूमिका पढ़िए
Dekho Mast Madari Aaya
Dekho Mast Madari Aaya : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' जी द्वारा लिखी गई वीरेंद्र कुमार भारद्वाज जी की नई किताब "देखो मस्त मदारी आया" की भूमिका आपके समक्ष प्रस्तुत है, पढ़ें और शेयर करें।
भूमिका
"बच्चो से बातें करती हुई सुंदर कविताएं"
- डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
वीरेंद्र कुमार भारद्वाज बिहार बाल भवन की किलकारी से जुड़े हैं। पटना में उनसे पहली बार मिलना हुआ। ढेर सारे बच्चों के मध्य उन्हें घिरा देख सहज ही उनके प्रति जिज्ञासा बढ़ गई। मैं चार दिन वहां रहा। वीरेंद्र जी ने स्वयं तो अपने विषय में कुछ न बताया लेकिन पर्त-दर-पर्त मैं उनके अनूठे व्यक्तित्व से रूबरू होता गया। आश्चर्य हुआ कि कोई व्यक्ति ऐसा भी हो सकता है जो पूरी तरह बच्चो के संसार में निमग्न है। हर पल हर-क्षण बच्चो की दुनिया में डूबा हुआ। बच्चो को साहित्य से जोड़ने की दिशा में उनका अवदान दृष्टव्य है। वे प्रणम्य हैं क्योंकि जब बच्चे मोबाइल की दुनिया से बाहर नहीं आना चाहते, वे उन्हें किताबों की दुनिया से जोड़ने को आतुर हैं। आतुर ही नहीं, सफल भी हैं। बच्चो को साहित्यिक प्रशिक्षण देने के लिए वे सारे दिन बाल भवन, किलकारी में रहते हैं। उन्हें बाल साहित्य के समर्थ लेखकों से जोड़ते हैं। अच्छे बाल साहित्य का बोध कराते हैं। बच्चो को जरूरत के अनुसार पर्यटन भी कराते हैं।
मैं साक्षी हूं कि कैसे गर्मी की छुट्टियों के दिनों में वे किलकारी के बच्चो को भोपाल ले जाने के लिए आरक्षण पाने की मशक्कत में लगे थे। टिकिट नहीं मिल रहा था और इस कारण बच्चों से ज्यादा वे परेशान थे। अधिकारियों के सहयोग से जब विशेष कोटे में समूह टिकिट क्या जारी हुआ, उनके चेहरे की खुशी देखने लायक थी। वे बच्चो में बच्चा बन जाते हैं। उनके भीतर एक निश्छल बालक है। जो भी उनसे जुड़ेगा, यह रहस्य सहज ही जान जाएगा।
सुप्रसिद्ध कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने लिखा है कि यदि आप बच्चो के साथ खेल नहीं सकते तो उनके लिए लिख भी नहीं सकते। वीरेंद्र जी बच्चो के साथ खेलते-चहकते-बतियाते हुए लिखने वाले रचनाकार हैं।
मुझे यह सूचना पाकर अनन्य हर्ष है कि उनकी नई पुस्तक आ रही है। वह भी बच्चो के लिए। बच्चो के लिए यह उनकी पहली पुस्तक होगी।
प्रकाश्य पुस्तक का नाम है देख मदारी आया। इसमें बाल कविताएं हैं। कुछ बच्चो से बात करती हुई। कुछ बच्चो की बात करती हुई।
उनकी कविताओं को पढ़ते हुए एक बात मोटे तौर पर उभरती है कि मूलतः गद्य विधा के रचनाकार होने के कारण वे शिल्प से अधिक भाव पक्ष के रचनाधर्मी हैं। बाल कविता में शिल्प की अनदेखी नहीं की जा सकती लेकिन जब अनुभूति का पक्ष सबल हो तो बच्चे उसे सहज अपना लेते हैं। वीरेंद्र जी का अनुभूति पक्ष सबल है। वे बाल मन के सुविज्ञ हैं और इसीलिए उनकी अभिव्यक्ति में बालोचित स्वभाव झलकता है। बच्चो की कल्पनाएं और आकांक्षाएं- अपेक्षाएं उनकी कविताओं में सहज मुखरित हैं।
ये कविताएं किसी समर्थ काव्यशास्त्री की कविताएं न लगकर, किसी सरल-सहज बच्चे के कोमल हृदय से उपजी कविताएं लगती हैं और यही इनकी सफलता है। बच्चे रुचिपूर्वक इन्हें पढ़ेंगे। आनन्दानुभूति करेंगे।
उनकी कविताएं विविध शैलियों में हैं। जैसे इस कविता में संवाद शैली में बिल्ली रानी से बात करते हुए बच्चे के मन में जो सवाल उपजे हैं वे नितांत मौलिक और चुलबुले हैं। यही नटखटपन उनकी कविताओं को बेजोड़ बनाता है : बिल्ली रानी, बिल्ली रानी, तुम तो हो जी बड़ी सयानी।
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Dekho Mast Madari Aaya Book by Virendra Kumar Bhardwaj |
दूध-मलाई हम क्या खाएं, पहला हक जब आप जमाएं। तुमको सब मौसी हैं कहते, मौसी क्या ऐसी होती है, बिल्कुल माँ जैसी होती है। पर तुम तो सब चट कर जाती, और डाँटने पर गुर्राती।
कह सकते हैं कि भारद्वाज जी की कविताओं में भोलापन है, जो बाल कविता की अनिवार्य शर्त है। बरगद पर भी इस संकलन में एक विशिष्ट कविता शामिल है जिसकी उपमाओं के क्या कहने : बरगद दादा, बरगद दादा, सिर पर अपने क्या है लादा ? बड़ी-बड़ी ये दाढ़ी तेरी, या माथे पर जटा घनेरी । लाखों चिड़ियाँ चूँ-चूँ करतीं, तेरी डाली-डाली फिरतीं ।
वीरेंद्र जी रोचक कल्पनाओं के कवि हैं। बच्चो का चिंतन उनके सृजन की विशेषता है। जब एक बच्चा दादा बन जाने की कल्पना करता है तो उनका लेखन कौशल देखते ही बनता है : अगर कहीं दादा बन जाऊँ, सब पर अपनी धाक जमाऊँ। पापा! आप गजब करते हैं, हुई सुबह और सोइएगा। उठिए झट तैयार होइए, न तो आप लेट होइएगा।
मम्मी! ऐसे घर चलता है, पापा रेडी, लंच में लेट। क्या ऑफिस में बॉस करेगा, इनके पहुँचने तक का वेट ? भैया अजय, सोनू, मोनू, बहुत बुरे हैं साथी तेरे।
अभी इनसे कुट्टी कीजिए, न तो नाम हँसेंगे मेरे। दादी सुनिए- इस घर, उस घर, आप ज्यादा न जाया करिए, चाची-भाभी दोनों सुनिए, बड़ों की सेवा किया करिए।
इस कविता में भाषा की दृष्टि से क्षेत्रीयता का प्रभाव है जो उसे क्षेत्रीय बच्चो के लिए रुचिकर बनाता है। क्षेत्रीय बच्चे उससे अपनी लोक भाषा के चलते आत्मीयता से जुड़ेंगे और दूरस्थ बच्चो को इससे इसलिए आनंद मिलेगा क्योंकि वे भाषा की दृष्टि से यहां कुछ अलहदा पाएंगे।
भारद्वाज जी की कविताओं में बालक हैं तो बालिकाएं भी। अगर न होता हमको पढ़ना उनकी प्यारी कविता है जहां कल्पनाओं की ऊंची उड़ान देखने को मिलेगी। देखिए,
अगर न होता हमको पढ़ना,कैसा लगता बोलो बहना? फिर तो मजे हमारे होते, सूरज, चंदा, तारे होते। सूरज से दिन भर बतियाते,
चंदा को आँगन में लाते। बादलों-संग ढोल बजाते, वर्षा को हम साथ नचाते। तारों का बनवाते गहना। तरह-तरह के खेल-खिलौने, माखन-मिश्री भर-भर दोने। खूब खेलता, खाता जी भर, रहता खुद पर ही तो निर्भर। रसगुल्लों की खेती होती,
मेरी बहन समोसे बोती। तब तो मस्ती का क्या कहना!
कुल मिलाकर इस संकलन की कविताएं बच्चो की अठखेलियों से भरी पूरी हैं। इनसे उनका मनोरंजन होगा। ज्ञान वर्धन भी होगा। शिक्षा भी मिलेगी।
इस अच्छी पुस्तक का स्वागत किया जाना चाहिए। मैं इसके प्रकाशन हेतु वीरेंद्र कुमार भारद्वाज जी को हार्दिक बधाई देता हूं।
मेरी शुभकामनाएं हैं, वे लिखें। खूब लिखें। खूब अच्छा लिखें। अपने स्नेहिल व्यवहार के कारण वे बच्चों के प्रिय हैं। अपनी रचनाओं से वे बच्चो में लोकप्रिय हों, यह मेरी सद्कामना है।
उनकी अन्य पुस्तकों की भी प्रतीक्षा रहेगी।
शुभेच्छु,
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