Kachu ki Topi Children's Story Collection Awarded with Bal Sahitya Puraskar 2019, Govind Sharma Children's Stories in Hindi, Bal Kahani Sangrah Kachu ki Topi.
Kachu ki Topi
बालकथा संग्रह काचू की टोपी : गोविंद शर्मा जी का बालकथा संग्रह काचू की टोपी को 2019 में बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। हिन्दी बालकथाओं के सरताज गोविंद शर्मा साहित्य जगत में प्रतिष्ठित लघुकथाकर, व्यंग्यकार, बाल साहित्यकार है, आज आपके लिए बाल साहित्य सरोकार पुस्तक से डॉ. नवज्योत भनोत जी द्वारा काचू की टोपी (बालकथा संग्रह) की समीक्षा प्रस्तुत है, पढ़ें और साझा करें।
बाल साहित्य पुरस्कार से पुरस्कृत बालकथा संग्रह
काचू की टोपी : गोविंद शर्मा
सन् 1972 से निरंतर लेखन में सक्रिय गोविंद शर्मा व्यंग्य, लघुकथा, बालकथा, जीवनी-लेखन एवं संपादन द्वारा साहित्य जगत को समृद्ध बना रहे हैं। अब तक आपके 45 से अधिक बालकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। गुणवत्ता के कारण आपकी कहानियाँ राजस्थान शिक्षा विभाग, महाराष्ट्र राज्य पुस्तक मंडल एवं डी.ए.वी विद्यालयों के अतिरिक्त अन्य निजी विद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं।
आपको प्रकाशन विभाग, भारत सरकार के प्रतिष्ठित भारतेंदु पुरस्कार, 'राजस्थान साहित्य अकादमी' के शंभू दयाल सक्सेना बाल साहित्य सम्मान सहित विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं एवं पत्रिकाओं द्वारा अनेक पुरस्कार, सम्मान एवं मानक उपाधियों से अलंकृत किया गया है।
साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत होने वाले राजस्थान के आप पहले हिन्दी बालकथा साहित्यकार हैं। यह पुरस्कार आपको 2019 में "काचू की टोपी" बालकथा संग्रह पर मिला। उन्नीस बाल कहानियों के इस संग्रह में संगृहीत कथाएँ असाधारण ईमानदारी, सच्चाई, दोस्ती, अपनत्व, साहस, सहकारिता, समझदारी, कर्तव्यबोध, श्रमनिष्ठा, विश्वसनीयता, दयालुता, आत्मनिर्भरता, विनयशीलता आदि जीवनमूल्यों के उदाहरण प्रस्तुत करती हुई बालकों को नवीन ऊर्जा एवं संतुलित दिशा प्रदान करती हैं।
इस संग्रह की पहली कहानी "काचू की टोपी" पहाड़ पर बढ़ती सर्दी से उत्पन्न मौसम एवं काम धंधे बंद होने के कारण गाँव छोड़कर मैदान आकर मजदूरी करने वाले ईमानदार काचू की है, जिसमें लेखक ने ईमानदारी के अनूठे मामले को अत्यंत नाटकीय ढंग से थाने में निपटा कर ईमानदारी को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है। पार्क में सोते समय टोपी चोरी होने से लेकर पुनः प्राप्त होने तक की यह कहानी अविश्वसनीय ईमानदारी और सच्चाई की पराकाष्ठा को छूती हुई गुदगुदाती है। शांत स्वभाव वाले काचू की नैतिकता उस सोए हुए व्यक्ति के सिर से अपनी ही टोपी उतारने की इजाजत नहीं देती। वह बिना बताए दूसरे के सिर से टोपी उतारने को चोरी की श्रेणी में रखता है। यहाँ तक कि वह टोपी उसके सिर से उतार लेने पर उसकी भावनात्मक गर्माहट की तरंगों को क्षीण होते महसूस करता है। ढूँढ़ने पर उसे वह व्यक्ति नहीं मिलता तो वह अपनी समस्या के समाधान के लिए थाने में जाकर अपनी ही टोपी को चुराई हुई मानकर थाने में जमा करवाना चाहता है। वह चाहता है यह चोरी की टोपी पुलिस की तलाशी प्रक्रिया से होती हुई उसे वापिस मिले। यह एक भोले एवं ईमानदार व्यक्ति की सच्चाई की पराकाष्ठा है कि वह अपनी ही टोपी को चोरी की हुई मानकर सजा पाने के लिए तत्पर होता है।
यह कहानी आज के युग में ईमानदारी और सच्चाई की विलुप्त होती प्रकृति की ओर भी संकेत करती है। इस तरह की ईमानदारी और सच्चाई के व्यवहार पर लोगों का उसे बुद्ध समझना समाज में बढ़ते झूठ, बेईमानी और गिरते जीवन मूल्यों के प्रति विचार करने और अपने भीतर झांकने को बाध्य करता है, कि लोग झूठ और बेईमानी का आवरण ओढ़ कर समझदार बन रहे हैं और ईमानदार लोगों को मूर्ख समझा जाता है। थानेदार द्वारा औपचारिक तौर पर काचू की टोपी को पहले जमा करना फिर उसे वापस देकर काचू को संतुष्ट करना, टोपी की खोई गर्मी वापस पाकर काचू का गहरी नींद में सो जाना जैसी घटनाएँ अत्यंत नाटकीयता से इस कहानी को अपने चरम पर पहुँचाती हैं। टोपी के भीतर वापस आई गर्मी सच्चाई और ईमानदारी की गर्मी है जिसे पाकर काचू प्रसन्न हो जाता है और टोपी पहनकर दो घंटे सोने की सजा के रूप में नींद लेकर सजा को पूरा करता है। सजा के लिए तत्पर काचू पुलिस से अपने लिए सजा की माँग करता है और इस प्रकार मनोरंजक तरीके से यह कहानी ईमानदारी और जीवन की विलुप्त हो रही सरलता की ओर संकेत कर जाती है।
इस संग्रह की दूसरी कहानी है "ईश्वर"। यह कहानी क्रिकेट के खेल में चौका छक्का लगाते, शोर मचाते बच्चों द्वारा कॉलोनी में खिड़कियों के कांच तोड़ने पर मोहल्ले वालों के कोप का सामना करने की सहज स्वाभाविक कहानी है। बच्चों के इसी खेल के बीच बदलती परिस्थितियों में ईश्वर अंकल के व्यवहार में परिवर्तन इस कहानी का उत्कर्ष है, जिसे वे राक्षस से ईश्वर में परिवर्तित होते देखते हैं। हमेशा चौका छक्का लगाने पर डांटने वाले अंकल एक दिन जब बॉल के पीछे दौड़ते हुए गड्ढे में धंसे टप्पू को तरकीब से बाहर निकालते हैं, तो वही खूंखार अंकल उनके लिए भगवान बन जाते हैं। यह कहानी बच्चों में व्यक्ति के एकांगी व्यवहार से बनी पूर्वधारणा का खण्डन कर जीवन को समग्रता से देखने की भावना को अनुप्राणित करती है, क्योंकि परिस्थितियों के बदलाव के साथ व्यक्ति का व्यक्तित्व अनेक रूपों में खिलता है। किसी एक परिस्थिति में हमारे सामने आया व्यवहार व्यक्तित्व का पूर्ण प्रतिबिंब नहीं होता और न ही वह संपूर्ण व्यवहार को निर्धारित करता है।
मनुष्य के भीतर अनेक प्रकार के विरोधाभासी गुण विद्यमान रहते हैं, जो समय और परिस्थिति के अनुसार प्रकट होकर उसके व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करते हैं। इस कहानी में ईश्वर अंकल उन बच्चों की दृष्टि में बहुत क्रूर और राक्षस थे, परंतु जब वे टप्पू की जान बचाते हैं तो वही इंसानियत से भरे नेक दिल इंसान या यूं कहें राक्षस से ईश्वर बन जाते हैं, "थोड़ा रोते, थोड़ा डरते टप्पू बोला अंकल आप जानते हैं हम बच्चों ने पहले आप को क्या नाम दिया था? हमने आपको राक्षस कहना शुरू कर दिया था क्योंकि आप हमारी बॉल दवा लेते थे। बॉल मौगने पर आपसे तमाचा मिलता था। मुस्कुराते हुए ईश्वर अंकल बोले अब क्या कहोगे? अंकल जो आपका नाम है, यानी ईश्वर भगवान। अंकल कहते हैं, "नहीं टप्पू मैं पहले भी इंसान था और अब भी इंसान हूँ।" मानवीय व्यवहार को व्यापकता के साथ ग्रहण करने के भावों के साथ-साथ यह कहानी इंसानियत के गुणों से भरपूर मानव को ईश्वर के समकक्ष रखकर भी इंसानियत अर्थात मानवीय गुणों की आवश्यकता को ही प्रमुखता देती है।
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काचू की टोपी (बालकथा-संग्रह) |
लेखक ने इस कहानी संग्रह में पशुओं, पक्षियों और जंगली जानवरों के माध्यम से प्रकृति और धरती पर रहने वाले प्राणियों के साथ मनुष्य के संबंधों के प्रति जागरूकता पैदा करने की दृष्टि से कई कहानियाँ लिखी हैं, ताकि प्रकृति और पर्यावरण के प्रति समर्पित चेतना के साथ बालक एकरूप हो सकें। "दोस्ती का पुल" इसी तरह की कहानी है जो मुसीबत के समय बड़े और छोटे जानवरों में दोस्ती का पुल बनाती हुई बालकों में परस्पर सहयोग की भावना को दृष्टि देती है। संवाद शैली में लिखी गई यह कहानी हास्य व्यंग्य के साथ विस्तार प्राप्त करती हुई अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती है। बरसात के कारण वन की सूखी नदी में पानी भर जाने के कारण नालापार करवाने के लिए हाथी दादा की मदद माँगने गए चिटकू खरगोश और हाथी के हास्य पुट से भरपूर चुलबुले, अर्थपूर्ण एवं गंभीर संवाद छोटे एवं बड़े जानवरों के बीच दोस्ती का पुल निर्मित करते हैं। पर्यावरण चेतना का विस्तार करती इस कहानी में हाथी दादा द्वारा एक बड़ा पेड़ उखाड़ कर नाले पर डालने की बात पर चिटकू खरगोश हांथी दादा को उनकी कसम याद दिलाते हुए कहते हैं "बड़ा पेड़ ? उस दिन तो आपने कसम खाई थी कि किसी हरे वृक्ष को जड़ से नहीं उखाड़ेंगे। आपने ही कहा था एक पेड़ उखाड़ने से कितने ही पक्षियों के घोंसले नष्ट हो जाते हैं। पर्यावरण को भी नुकसान होता है।" चिटकू हाथी और खरगोश का यह संवाद भावात्मक एकता के साथ-साथ वृक्षों एवं वनस्पतियों के संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा करते हुए पारिस्थितिक तंत्र के प्रति दायित्व की भावना को प्रकट करता है। यहाँ हाथी का स्वीकार-बोध कहानी का खूबसूरत भाव है। हाथी दादा पर्यावरण के प्रति कसम भूलने पर झेंपने या क्रोधित होने की बजाय कसम याद दिलाने के लिए चिटकू खरगोश को धन्यवाद देते हुए छोटे जानवरों के लिए पुल बनने को तैयार हो जाते हैं। विशालकाय हाथी की यह सोच बालकों के लिए सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करती है। चिटकू खरगोश प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी को सतर्कता से निभाते हुए हाथी दादा के उदात्त गुणों को उभारकर प्रदर्शन के इस युग में क्षीण होते जा रहे सहृदयता के पुल को निर्मित करने का कार्य करता है।
इसके अतिरिक्त इस कहानी में हाथी दादा, चिटकू खरगोश और चींटियों के संवाद अत्यंत सहज और अपनेपन की मिठास के साथ बड़े लक्ष्यों पर केंद्रित रहने का संदेश प्रेषित करते हुए उद्देश्य की ओर ले जाते हैं। कुछ चींटियां वादा निभाती हैं कुछ वादाखिलाफी भी करती हैं, लेकिन हाथी द्वारा उनके जीवन की सुरक्षा की खातिर अपना धैर्य कायम रखते हुए वादे को निभाना प्रेरक भाव है। वे कहते हैं "मैंने अपने पर मजबूती से काबू रखा। मैं न तो कांपा और न ही छींका, यदि मैं कांपता तो कई छोटे जानवर पानी में गिर जाते, अगर मैं छींकता तो मेरे आसपास घूम रही चींटियों के लिए चक्रवाती तूफान होता। तब मेरा पुल बनना बेकार चला जाता।"
प्रकृति, समाज और सामूहिकता में विश्वास पैदा करने के लिए गूंथी गई यह कहानी छोटे-बड़े जानवरों के मध्य दोस्ती निभाने, वादा निभाने, परोपकार और सहनशीलता इत्यादि मूल्यों को पोषित करने की दृष्टि से भी विशेष महत्त्व रखती है।
इसी प्रकार "मोबाइल कबूतर" नामक कहानी में पालतू कबूतर के माध्यम से लेखक ने सहजता से परिवेश ज्ञान भरने का कार्य किया है। राजू का सहपाठी सरजू बाढ़ में फँसे अपने दोस्त राजू को बचाने के लिए पालतू कबूतर के गले में मोबाइल और छोटा चॉकलेट बांधकर राजू से संपर्क स्थापित कर उसे बाढ़ के पानी से निकालने में सफल हो जाता है। आज तकनीक के युग में कबूतर का संदेशवाहक रूप प्रथम दृष्टया भले ही अव्यावहारिक लगे, लेकिन रास्ते की विशेष पहचान में माहिर मिलनसार पक्षी के रूप में प्रचलित कबूतर की यह कहानी पूर्ण रूप से काल्पनिक नहीं है। पुराने समय में कबूतरों द्वारा चिट्ठियाँ भेजने और युद्ध के दौरान संदेशवाहक के रूप में भेजे जाने की कहानियाँ हम सब ने सुनी हैं। आज भी हम अपने आसपास बहुत से पालतू कबूतरों को देखते हैं, जो दिन भर बाहर रहने के बावजूद शाम को अपने पालक के घर लौटकर उनके साथ अपने जुड़ाव का परिचय देते हैं। किसी जमाने में कबूतरों का उपयोग ऊँचाई से दुर्लभ तस्वीरें खींचने अर्थात एरियल फोटोग्राफी में भी किया जाता था। लेखक ने इस आधुनिक, कथानक की रचना प्रक्रिया के समय इन ऐतिहासिक मान्यताओं को अवश्य ध्यान में रखा होगा। जाहिर है इन सभी ऐतिहासिक तथ्यों की तरफ बालकों का ध्यान आकृष्ट करना तथा उत्सुकता बढ़ाना इस कहानी का गूढ़ मंतव्य है। यथार्थ और कल्पना के मिश्रण से मानवीय मूल्यों की दृष्टि से उदात्त यह कहानी बच्चों को सुखद कल्पना लोक में ले जाती है।
"अब नादानी नहीं" कहानी भी झील किनारे जंगल की दुनिया के बीच हाथी और हिरण के बच्चों के जरिए जीवन की समझने का नजरिया बनाती है। झील के किनारे खड़े होकर हाथी का उपहास करने वाले हिरण के बच्चे हीटा का जोश में असावधान होकर मगरमच्छ की चपेट में आना और हाथी द्वारा उसे मगरमच्छ के चंगुल से छुड़ाकर उसका जीवन बचाना, जीवन के प्रति व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने का अवसर प्रदान करता है। किसी के बाहरी वेश और शांत स्वभाव के कारण उसकी शक्ति को कम आंकना एक बड़ी भूल हो सकती है। यहाँ मुसीबत में बिना किसी पूर्वाग्रह के दूसरों की सहायता करने का भाव बच्चों में रोपने का कार्य किया गया है। बच्चे हाथी के माध्यम से ये भी जान पाते हैं कि किसी की जान बचाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उन्हें सुरक्षित हाथों तक पहुँचाना भी है, "हाथी ने उस पर पानी के छींटे मारे, हिलाया-डुलाया और होश में लाने की कोशिश की। घायल हीटा के पास हीरा और हीफा भी आ गए थे। पर हाथी ने इन बच्चों के भरोसे उसे नहीं छोड़ा। वह तब तक हीटा के पास बैठा रहा, जब तक उसके पास कई हिरण के साथ उसके माता-पिता नहीं आ गए।
अपनी ताकत का झूठा गुमान करने वाले हिरणों का भ्रम तोड़ती यह कहानी दूसरों का सम्मान करते हुए विनम्रता धारण करने की सीख तो देती ही है, साथ में किसी के बुरे व्यवहार से अपनी सहजता न खोने तथा बुरा बर्ताव करने वाले के प्रति भी उदार बने रहकर मुसीबत में उसकी मदद करने के भाव प्रेषित करती है।
इसी प्रकार "तारक” नामक घोड़े की स्वामिभक्ति, वफादारी एवं आदर्श की कहानी भी इस संग्रह की महत्त्वपूर्ण कहानी है। अनेक बार युद्ध और शिकार के समय राजा तरंगपाल के साथ पूरी वफादारी निभाने वाला उनका अतिप्रिय, विशेष घोड़ा तारक राजा को अपनी प्रजा के अधिकारों, आवश्यकताओं तथा राजधर्म के प्रति जागरूक करता है। लेकिन राजा द्वारा जनता के अधिकार हनन और जनता पर अन्याय के विरोध में तारक राजा की आज्ञा न मानकर जनता का साथ देता है। राजा के अहंकार को ठेस पहुँचाने के कारण राजा, तारक को ऊँची पहाड़ी पर ले जाकर मृत्युदंड देना चाहता है, लेकिन इसी बीच पहाड़ी के पहले घने जंगल के पास निःशस्त्र राजा पर अचानक हमला होने पर तारक हमलावरों पर विजली की तरह टूट पड़ता है। खुद घायल होकर राजा को बचाकर अपनी वफादारी से राजा के अहंकार को पश्चाताप में परिवर्तित कर देता है। राजा कह उठते हैं "जिसे मैंने नमकहराम कहा उसी ने अपनी बहादुरी और बुद्धिमत्ता से युद्ध कर मुझे बचाया। जिसकी में जान लेने जा रहा था, उसी ने मेरी जान बचाई। सत्ता के घमंड और गुस्से ने मेरी बुद्धि का हरण कर लिया था। आज मुझसे बड़ा अनर्थ होने जा रहा था।"
इस प्रकार रोमांच, ऊर्जा तथा मानवीय गुणों से भरपूर तारक राजा में जनता के प्रति समर्पण एवं सहयोग की भावना को संचारित कर गुरु की भूमिका निभाता है। राजा स्वयं कहते हैं, "अब तक तारक मेरा अंगरक्षक था। आज उसने एक गुरु की भूमिका निभाई है। उसने मुझे सिखाया है कि अपने ही निहत्थे लोगों पर हमला नहीं किया जाता। राज्य के पानी पर पहला हक लोगों का और खेतों की प्यास का है।"
चूहे और बिल्लियों की कहानियाँ बच्चों की प्रिय कहानियाँ रही हैं। लेखक ने बालमन की ऐसी प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर "चूहे की घंटी" नामक कहानी में चूहों की सूझबूझ और सूंघने की शक्ति को विषय बनाकर सदैव सतर्क रहकर अपनी रक्षा का जिम्मा स्वयं लेने और चालाक लोगों पर कभी भी पूर्ण विश्वास न करने की सलाह दी है।
इसी प्रकार आज के समय में, बढ़ती अवसरवादिता एवं स्वार्थवृत्ति से बालकों को दूर रखने के उद्देश्य से तेजू खरगोश और सुस्तू कछुए की कहानी लिखी गई है। यह कहानी औपचारिकता और प्रदर्शन की बजाय वक्त पर किसी के काम आने को ही सच्ची दोस्ती के रूप में प्रस्तुत करती है। तेजू खरगोश यहाँ स्वार्थ सिद्ध करने वाले, झूठी मित्रता गांठने वाले पात्र के रूप में चित्रित है। लेकिन सुस्तू दोस्ती निभाने की योग्यता के साथ-साथ स्वार्थी दोस्त की स्वार्थी वृत्ति को खत्म करने के लिए सूझबूझ से काम लेकर उसके भीतर की अच्छाई को भी बाहर निकालने में सफल हो जाता है। तेजू, सुस्तू के सामने स्वीकार करता है, "मैंने स्वार्थवश तुम्हें पक्का मित्र कहा था। सोचा था बरसात तो होती रहती है। पानी के गड्ढे पार करने में तुम्हारी मदद लेता रहूँगा। इसलिए सबके सामने तुम्हें मित्र कहा था। अब मैं समझ गया हूँ कि मैं गलती पर था। अब मैं सच में दोस्त बन गया हूँ।" इतने पर भी सुस्तू खरगोश को लगता है कि अभी भी उसके भीतर प्रदर्शन वृत्ति बची है तो वह उसे दिखावे और दोस्ती का अंतर समझाकर जरूरत के समय दोस्ती निभाने का महत्त्व बताते हुए कहता है, "सुनो दोस्ती का मतलब यही होता है कि वक्त पर दोस्त के काम आओ।" यह कहानी हर व्यक्ति की उपयोगिता और महत्ता का सम्मान करने तथा मैत्रीभाव को जीवन में पुष्ट करने की सीख देती है।
इसी संग्रह की "शेर की आजादी" कहानी में भी शेर और चूहे की कथा को माध्यम बनाकर छोटे से छोटे जानवर के महत्त्व को अंकित किया गया है। एक छोटा चूहा जाल में फंसे हुए शेर को अपने तीखे दाँतों से कुतरकर आजाद कर देता है। लेकिन कृतघ्न शेर मुँह खुलते ही झूठे अभिमान के लिए उस चूहे को मारने का प्रयास करता है। वह नहीं चाहता कि कोई यह बात जाने कि जंगल के सबसे शक्तिशाली शेर की जान डरपोक चूहे की वजह से बची है। लेकिन छोटा चूहा मुसीबत में धैर्य और बुद्धिमत्ता से काम लेता है और प्रत्युत्पन्नमति से शेर को चकमा देकर अपनी जान भी बचा लेता है तथा शेर के हृदय परिवर्तन का कारण भी बनता है। इस प्रकार शेर चूहे की सहयोग की भावना को प्रचारित करता हुआ कृतज्ञता से कहता है, "जंगल के सब जानवरों को मैं स्वयं बताऊँगा कि शिकारियों के जाल से सावधान रहें और कभी जाल में फँस जाएँ तो चूहों से मदद जरूर लें। मैं भी आज एक छोटे चूहे से मिली सहायता की वजह से आजाद हूँ।" यह कहानी बच्चों में सहयोग भावना के साथ-साथ सहयोग करने वाले के प्रति कृतज्ञ रहने के भाव को पुष्ट करती हुई झूठे अभिमान से मुक्त रहने, धैर्य रखने, दूसरे का सम्मान करने, बराबरी की भावना, दया, परोपकार एवं विनम्रता इत्यादि भावों को समझ कर जीवन में धारण करने की सोच विकसित करती है।
एक अन्य कहानी "शेर और चिड़िया की दोस्ती" में भी अपनी शक्ति के घमंड में चूर शेर के अहंकार पर नन्ही चिड़िया द्वारा चोट करते हुए जीवन में छोटे-बड़े सबकी अपनी-अपनी अहमियत के कारण सम्मान करने की सीख दी गई है। बच्चे इस कहानी से यह जान पाते हैं कि एक नन्ही चिड़िया भी अपनी कार्यशैली, समझदारी तथा जीवन में आगे देखने की प्रकृति के कारण शेर को सलाह देने की हैसियत रखती है। उसकी सलाह पर चलकर शेर अपने जीवन की समस्या का समाधान भी प्राप्त करता है। दूसरों को डरा कर रखने वाला जंगल का राजा ताकतवर शेर भी तूफान की शक्ति से बेघर हो जाता है। उसकी गुफा के सामने पड़ा एक पेड़ उसे शक्तिविहीन कर देता है जबकि एक नन्ही चिड़िया तूफान में उड़े घोंसले को बिना किसी देरी के बनाने में जुट जाती है और मुसीबत में कैसे शेर को दोस्ती के हवाले से हाथी से मदद माँगने की सलाह देती है। इस प्रकार वह शेर का अहंकार दूर कर उसके भीतर के अच्छे गुण विकसित करने में सफल होती है। शेर द्वारा चिड़िया का अच्छा पड़ोसी और अच्छा दोस्त बनकर कृतज्ञता ज्ञापित करना बालकों में सहजीवन के गुण उभारने में सक्षम है।
शेर और चिड़िया के चंचल-चुटीले संवादों में किसी भी प्रकार के नुकसान के बावजूद निराशा और परेशानी से दूर रहने और व्यर्थ की बातों में समय नष्ट न करने का संदेश निहित है। निरंतर अपने कार्य पर ध्यान केंद्रित कर जीवन में आगे बढ़ते रहने की ऊर्जा प्रदान करती हुई यह कहानी अहंकार जैसे भावों के प्रति जागरूक करती हुई बताती है कि अहंकार किसी को भी ले डूबता है। प्रकृति में इतनी शक्ति है कि वह सब का अहंकार चूर करती हुई विभिन्न तरीकों से जीवन में समझ पैदा करने का अवसर प्रदान करती है।
इस संग्रह की "घोड़ी का बच्चा" कहानी चित्रकार की सुंदर और प्रिय घोड़ी के लगाव की कहानी है। आजीविका के लिए घोड़ी पर जाकर पेंटिंग बेचने वाले चित्रकार को तूफान के कारण किसी अजनबी के घर रुकना पड़ता है, जहाँ उसी रात घोड़ी द्वारा पैदा किए गए बच्चे को छुपा लिया जाता है। पंच भी जहाँ इस समस्या को हल कर पाने में असमर्थ रहते हैं, वहीं घोड़ी अपने ममत्व और सूंघने की शक्ति द्वारा मानव के लालच, झूठ और स्वार्थ का पर्दाफाश कर समस्या का समाधान करती है, "उसी समय घोड़ी हिनाहिनाती 'स्वयं को छुड़ाने की कोशिश करने लगी। चित्रकार ने उसे छोड़ा तो गृह तेजी से पिछवाड़े की ओर गई और दरवाजे के टक्कर मारते हुए अनुग्रह से स्वामी की ओर देखने लगी। कमरे का दरवाजा खुला तो सभी आश्चर्यचकित रह गए। कमरे में कचरे के ढेर पर घोड़ी का नवजात पड़ा था।" इस प्रकार घोड़ी के ममत्व के कारण चित्रकार को अपनी घोड़ी का बच्चा सही सलामत मिलना मानव से ज्यादा पशु की समझदारी को सिद्ध करता है। यह कहानी बच्चों के मन में पशु प्रेम को जगाती हुई घोड़ी की प्रवृत्तियों के बारे में ज्ञानवर्धन तो करती ही है साथ में यह विश्वास भी जाग्रत करती है कि जीत सदैव सत्य की होती है और झूठ को अंततः हार का सामना करना ही पड़ता है। (शेष आलेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें Kachu ki Topi- 2)
- डॉ. नवज्योत भनोत
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