Kachu ki Topi Children's Story Collection Awarded with Bal Sahitya Puraskar 2019, Govind Sharma Children's Stories in Hindi, Bal Kahani Sangrah Kachu ki Topi.
Kachu ki Topi (2)
बालकथा संग्रह काचू की टोपी : गोविंद शर्मा जी का बालकथा संग्रह काचू की टोपी को 2019 में बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। हिन्दी बालकथाओं के सरताज गोविंद शर्मा साहित्य जगत में प्रतिष्ठित लघुकथाकर, व्यंग्यकार, बाल साहित्यकार है, आज आपके लिए बाल साहित्य सरोकार पुस्तक से डॉ. नवज्योत भनोत जी द्वारा काचू की टोपी (बालकथा संग्रह) की समीक्षा प्रस्तुत है, पढ़ें और साझा करें।
Children's story collection awarded with bal sahitya puraskar
यह इस लेख का दूसरा भाग है, पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें काचू की टोपी - 1
काचू की टोपी : गोविंद शर्मा
इन कहानियों में पशु पक्षियों के साथ-साथ रस्सी भी अपने नाम की सार्थकता सिद्ध करती हुई संकट में रस्सी बुनने वाले का साथ देकर सत्य को उजागर कर उसे न्याय दिलवाती है। झूठ आखिर झूठ होता है। झूठ के पांव नहीं होते। झूठे व्यक्ति की सदैव हार होती है। इसी भावना को संप्रेषित करते हुए गाय को बांधने वाली रस्सी, पैसे के बदले रामू की गाय को नदी पार करवाने के बहाने, गाय पर अपना अधिकार जमाने वाले ठग के झूठे नाटक की पोल खोल देती है। मदद के ढोंग में पनपते स्वार्थ, बेईमानी, ठगी और धोखाधड़ी के व्यापार के प्रति सतर्क करते हुए सच्चे व्यक्ति के पक्ष में रस्सी का बोल उठना इस बात का परिचायक है कि झूठ की बुनियाद न होने के कारण वह ज्यादा देर तक नहीं टिक पाता। मेहनत से बनी हुई रस्सी भोले भाले आदमी की सच्चाई एवं मेहनत की चमक बनकर उसे संकट और दुविधा से निकाल कर अपना अद्भुत प्रभाव दिखाती है।
यह कहानी बच्चों के मन में मेहनत और ईमानदारी के प्रति श्रद्धा के भाव भरते हुए झूठ, ठगी और बेईमानी से दूर रहने के साथ-साथ यह संदेश भी प्रेषित करती है कि मेहनत और निष्ठा से काम करने वाला व्यक्ति अपने जीवन के धरातल को इतना मजबूत बना लेता है कि उसके द्वारा किया गया काम संकट के समय उसका सहयोग करता है और झूठ कितना भी चतुराई के साथ क्यों न बोला जाए अंततः पकड़ा ही जाता है। रस्सी यहाँ एक सच्चे और ईमानदार व्यक्ति की गवाह बनकर बोल उठती है। यह बोलना ही रस्सी की शक्ति है, जिसके बल पर रामू अपने पशुधन के साथ-साथ अपनी आजीविका और परिवार को बचाने में कामयाब हो जाता है।
इसी प्रकार "पाँच सी का नोट" कहानी में भी कंडक्टर की धूर्तता, बच्चों की ईमानदारी और बस में सवार व्यक्तियों की सहृदयता के माध्यम से धूर्त लोगों से सावधान करते हुए ईमानदारी, सहानुभूति, उदारता और कृतज्ञता जैसे मूल्यों को बचाए रखने और जीवन में एक दूसरे पर विश्वास बनाए रखने की भावना पर बल दिया गया है। यह कहानी उन ईमानदार, परोपकारी और निःस्वार्थ व्यक्तियों को रेखांकित करती है जो किसी की मदद करके जताना भी नहीं चाहते। वे सिर्फ निःस्वार्थ भाव से काम करते हुए मानवीय विश्वास को बचाकर समाज को समृद्ध करने का कार्य करते हैं। इस कहानी में एक तरफ क्रूर, धोखेबाज, मानवीय मूल्यों से विहीन कंडक्टर है जो बालकों को नाजायज तंग करके उनके रुपए हड़पना चाहता है और बस की अन्य सवारियों को भी गुमराह कर परेशान करता है, तो दूसरी तरफ इसी बस में कई उदार व्यक्ति भी हैं जो उन बालकों को भयभीत देखकर उनकी टिकट के लिए रुपए भी देते हैं, कंडक्टर को पाँच सौ का नोट वापिस करने के लिए बाध्य करते हैं और उन बच्चों की परेशानी दूर करने के लिए पाँच सौ का नोट बदल भी देते हैं और यहाँ तक कि नोट के नकली होने की संभावना को भी दबा देना चाहते हैं। नोट बदलने वाला व्यक्ति कहता है "अब बस से उतरते ही सीधा बैंक जाऊँगा यह नोट चेक करवा लूँगा। यदि नकली हुआ तो वहीं फाड़ कर फेंक दूंगा। फिर भी मुझे यही लगेगा कि मैंने आज पाँच सौ रुपए सही जगह खर्च किए हैं।" अर्थात नकारात्मक संदेश से होने वाले प्रभाव को मिटाकर सकारात्मक सोच को समाज में सम्प्रेषित कर आदर्श मूल्यों की स्थापना का विश्वास यहाँ कहानी का उदात्त मूल्य है। यह कहानी धूर्त लोगों से सावधान रहने के साथ-साथ असली नकली नोट की पहचान रखने की सीख भी देती है।
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Kachu ki Topi (children's story collection) |
इस संग्रह की कहानियों में नन्हे विद्यार्थियों को जीवन में निरंतर सीखने के अवसरों के बारे में बताते हुए यह विचार प्रेषित किया गया है कि व्यक्ति को सीखने के लिए कहीं से भी, कुछ भी उपलब्ध हो सकता है। सीखने की प्रक्रिया में कोई छोटा बड़ा या कम ज्यादा नहीं होता। घर, पड़ोस, दोस्त, स्कूल, पुस्तक, पत्रिका, बस, ट्रेन में सफर करते समय हमें बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है। सत्य और ईमानदारी का महत्त्व बताते हुए "सीख सुहानी बचपन की" कहानी यही विचार प्रेषित करती हुई ईमानदारी की वजह से पूरे शहर में प्रसिद्ध सेठ जी का उदाहरण प्रस्तुत करती है। सेठ जी ईमानदारी का पाठ दस वर्षीय बालक से पढ़ते हैं। उनके द्वारा हिसाब करके ज्यादा दिए गए पच्चीस रुपए लौटाने आए बालक की ईमानदारी से प्रभावित होकर सेठ जी अपने भीतर अंकुरित होते लोभ को छोड़कर एक बुजुर्ग द्वारा गलती से ज्यादा दिए गए पैसे लौटाकर हमेशा के लिए ईमानदारी के प्रतीक बन जाते हैं। सेठ की ईमानदारी के साथ-साथ लेखक ने इस कहानी में उदात्त मूल्यों को बालकों में विकसित होते दिखाया है। कहानी के अंत में बच्चों का अपने शिक्षक को यह कहना कि "सर आप हमें न बताएँ कि आप हमसे बहुत कुछ सीखते हैं, वरना हम में से किसी को यह घमंड हो जाएगा कि वह गुरु है। हमें तो आप शिष्य ही रहने दें।" आज के युग में बच्चों द्वारा अहंकार जैसे भाव को विनम्रता से जीतने का यह प्रयास इस कहानी की मूल्यात्मक उपलब्धि है।
आज हम कृत्रिम जीवन जीते हुए शारीरिक श्रम से दूर हो रहे हैं। हमारे आसपास ऐसा परिवेश विकसित हो रहा है कि हम अपना ही काम करना शान के खिलाफ समझने लगे हैं। आज व्यक्ति अपने छोटे-छोटे व्यक्तिगत काम भी दूसरों से अर्थात नौकरों से करवाना पसंद करता है। समाज में बढ़ती इसी मानसिकता को नियंत्रित करने के उद्देश्य से लिखी गई "नींद की गोली" कहानी सेठ दुर्गादास और मजदूरी करने वाले दीनू की कहानी है, जिसमें शारीरिक श्रम के अभाव के कारण अनिद्रा रोग के शिकार सेठ दुर्गादास और बगीचे में काम करने वाले दीनू की सहज नींद को विषय बनाकर शारीरिक श्रम की महत्ता को प्रकट किया है, ताकि आज के बच्चे सेठ दुर्गादास और मेहनत मजदूरी करने वाले दीनू की जीवन शैली के अंतर को समझ कर शारीरिक श्रम को अपनाकर अपने जीवन को स्वस्थ एवं सुंदर बना सकें। इसी उद्देश्य से लेखक दीनू के मुख से कहलवाते हैं, "सेठ जी मुझे नींद इसलिए अच्छी आती है कि मैं दिन भर खूब मेहनत करता हूँ। इस मेहनत की वजह से ही भूख भी अच्छी लगती है। आपके बेटे को भी नींद इसलिए अच्छी आती है कि वह खूब साइकिल चलाता है। यदि आप भी शारीरिक श्रम करेंगे तो आपको भी मनचाही नींद आएगी और भूख लगेगी।"
अपने घर से ही मेहनत की शुरुआत का विचार प्रेषित करती इस कहानी में किचन गार्डन में काम करना, साइकिल चलाना, खेल खेलना इत्यादि सहज सी क्रियाओं को दिनचर्या में शामिल करने की अपेक्षा की गई है। शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तरों को गहराई से छूती इस कहानी में लेखक ने स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़े खतरे के रूप में घर बनाती नींद की गोली से बचने का बहुत ही सरल और सहज उपाय सुझाया है। अपने ही घर के कार्यों को करने का आनंद लेते हुए शरीर एवं मन को स्वस्थ रखकर दवाओं के कुप्रभाव से भी बचने का सदिश भी यहाँ जीवन रक्षा का संदेश है।
लेखक ने वर्तमान परिवेश में बढ़ती आत्मकेंद्रित वृत्ति एवं वैयक्तिकता से ऊपर उठकर सामूहिकता के आनंद की तरफ प्रेरित करने का कार्य इस कहानी संग्रह में किया है। "कागज की नाव" कहानी में कागज की नाव बनाना सिखाने वाली टिन्नी का अन्य बच्चों के साथ नाव प्रतिस्पर्धा खेल न खेलकर दूसरे बच्चों की जीत में शामिल होकर संतोष करना वर्तमान स्थितियों में जीवन के प्रति गहनबोध प्रकट करता है। परिपक्वतां के साथ व्यापक भाव अपनाने वाली टिन्नी, दूसरों की मदद करने वाली और ध्यान रखने वाली ईमानदार बालिका के रूप में हृदय को प्रभावित करती है। घोखे से खेल में आगे बढ़ना उसे जंचता नहीं, इसी संदर्भ में मामा की भावपूर्ण उत्तर देती हुई वह कहती है, "देखो मामा सभी नावें मेरी ही होती हैं, किसी की भी नाव आगे जाए वह मेरी होगी, इसीलिए में ही जीतती हूँ।" टिन्नी का जीवन के प्रति यह आश्वस्तिपरक दृष्टिकोण बच्चों में स्वस्थ प्रतियोगिता दृष्टि, निश्छल भाव तथा तटस्थता के भाव विकसित करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। आज बच्चों में जिम्मेदारी और छोटे भाई-बहनों का ध्यान रखने की विलुप्त होती प्रवृत्ति के समय टिन्नी का बड़े होने के नाते जिम्मेदारीपूर्वक छोटे कन्नू मन्नू का खेल के समय पूरा ध्यान रखना अत्यंत प्रेरणादायी है। वह कहती है "मामा मैं इन सब से बड़ी हूँ न । इनकी रक्षा करना मेरी जिम्मेदारी बन जाती है। हमें किसी को नहीं मालूम कि पानी वाला यह गड्ढा कितना गहरा है। उसकी सतह दलदली है या चिकनी है। इसलिए नौका दौड़ के समय मेरा ध्यान इस बात पर ज्यादा रहता है कि कोई गड्ढे में एक निश्चित सीमा से आगे न जाए।" इस प्रकार नाव के खेल का त्याग करते हुए सोच में सबसे आगे रहने वाली टिन्नी वास्तव में संबंधों तथा परिवेश के प्रति जागरूक बालिका के रूप में बालकों की प्रेरणा का स्रोत बनती है। आज जब सड़कों पर जगह-जगह गड्ढे पसरे हैं। प्रतिदिन उनके कारण होने वाली दुर्घटनाओं के समाचार प्राप्त होते हैं, ऐसे में बालकों की चेतना जागृत करने की दृष्टि से टिन्नी प्रेरक पात्र के रूप में बच्चों के मन को अवश्य प्रभावित करती है।
आज के समय में कार्टून तथा अतिमानवीय कृत्यों के प्रति बच्चों के बढ़ते रुझान को सही दिशा में ले जाने के प्रति भी इस संग्रह में ध्यान दिया गया है।
यथार्थ से परे अति कल्पना में रोबोट की तरह एक बार कहने से दिन भर हुकुम बजाने वाली सुपरसाइकिल की इच्छा रखने वाले बंटी के स्वप्न के माध्यम से सुपरसाइकिल की उपलब्धता से अस्वाभाविक और दुरूह होते जीवन को प्रकट किया गया है। बच्चों के जीवन में साइकिल बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। साइकिल का चाव बच्चों में देखते ही बनता है। लेकिन बंटी की सुपरसाइकिल पत्थर की लकीर की तरह उसके आदेश का पालन करती हुई उसके लिए संकट बन जाती है। उसकी दोस्तों के साथ से मिलने वाली छोटी-छोटी खुशियाँ विलुप्त हो जाती हैं। स्टेडियम जाकर क्रिकेट का खेल देखने की, कहीं भी ब्रेक लगाने की, मस्ती से बेपरवाह होकर साइकिल चलाने की उसकी आजादी छिन जाती है। विशेष क्षमता वाली सुपर साइकिल से दूसरों पर रौब जमाने की इच्छा उस पर भारी पड़ती है। सुपर साइकिल की वजह से जब वह अपने जीवन की हँसी-खुशी और सहजता खो देता है, तब उसे समझ आता है कि आदेशों में बंधी साइकिल उसके जीवन को असहज और अस्वाभाविक बना रही है। वह साइकिल जिसे वह आदेश देकर साथियों में ऊँचा और विशेष होने का मौका तलाश रहा था, वही साइकिल उसके नियंत्रण से बाहर होकर उसे हँसी और उपहास का पात्र बना रही थी।
बच्चों में आजकल सुपरमैन बनने की बलवती भावना को केंद्र में रखकर लेखक ने स्वप्न में बंटी की अप्राकृतिक इच्छा के दुष्परिणाम दिखाकर बच्चों को सहज प्राकृतिक जीवन जीने की ओर प्रेरित किया है।
अपना कार्य खुद करने का संदेश सुंदर ढंग से देते हुए बंटी कहता है "यदि मेरा यानी साइकिल का सारा काम खुद साइकिल ही कर देगी तो मैं क्या करूँगा? मैं क्या सीखूँगा? क्या मुझे असावधान रहने की आदत नहीं पड़ जाएगी? आज मैं ऐसी साइकिल लूँगा तो कल ऐसी नोट बुक की माँग करूँगा, जिससे अपने आप होमवर्क हो जाए। ऐसी चम्मच चाहूँगा जो प्लेट से उठाकर खाना मेरे मुँह में डाल दे। नहीं, नहीं, यह सब मैं अपने हाथों से करना चाहता हूँ। मुझे पुरानी जैसी ही साइकिल चाहिए। मैं नियमों को मानकर साइकिल चलाऊँगा। और उसी को सुपर साइकिल बना लूँगा। नहीं चाहिए मुझे सुपर साइकिल ।" बालक के स्वानुभव से अनावश्यक और अनुचित माँग के प्रति नकार द्वारा उचित निर्णय लेकर निष्कर्ष पर पहुँचती इस कहानी का उद्देश्य बालकों की आत्मनिर्भरता और विकास में बाधक बनने वाले विचारों पर रोक लगाना तथा कार्य संस्कृति को बनाए रखना भी है। निश्चित तौर पर यह कहानी बालकों में कर्मनिष्ठा, धरातल पर जीवन जीने, अपने जीवन के कार्य, नियम, अनुशासन स्वयं संचालित करने की प्रेरणा देती है।
इस कहानी संग्रह में कथाकार ने ग्रामीण परिवेश में प्रचलित कथा को उभार कर बालकों के अनुभव तथा विश्लेषण द्वारा प्रचलित विश्वास को खंडित करते हुए जीवन का दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास किया है। लेखक ने रोमांचक तरीके से बेरी के पेड़ पर भूत्त के प्रचलित विश्वास को खारिज कर बालकों द्वारा परिस्थितियों का सशक्तता से सामना करने की शक्ति को उभारा है। बेर प्राप्त करने के लिए फेंके गए जूते का बेरी पर टंगा रह जाना और उसकी जगह चप्पल का नीचे आना जैसी सामान्य घटनाएँ रचकर लेखक ने बालकों के मन के सहज भय और रोमांच से कथानक को गति प्रदान करते हुए प्रचलित विश्वास के रहस्य को अनावृत कर पूरी तरह से उस भय से मुक्त करवाया है। बच्चों का खेत काका द्वारा फैलाई अफवाह के बावजूद साहस से टोली बनाकर योजनाबद्ध तरीके से भूत का मुकाबला करने के लिए निकल पड़ना आज के बच्चों में मानसिक सबलता उत्पन्न करने की दृष्टि से उपयोगी है।
अतः यह कहानी सुनी सुनाई बातों पर विश्वास न करके हिम्मत और साहस से स्वयं के अनुभव द्वारा समस्या की गहराई में जाकर समाधान प्राप्त करने की प्रेरणा और शक्ति देती है। रोचकता और जिज्ञासा से परिपूर्ण यह कहानी पूर्व निर्धारित धारणाओं को संतुलित सोच, तटस्थता, अनुभव और विचारों की अभिनवता से देखने की भी दृष्टि प्रदान करती है।
इस संग्रह की "किताबों के पैर" कहानी में बोलचाल की भाषा में असावधानी से रचे-बसे वाक्यों की तरफ ध्यान आकर्षित कर भाषा की शुद्धता को बनाए रखने का संदेश दिया गया है। लेखक हँसी मजाक में, कथानक को आगे बढ़ाते हुए किताबों के पैर होने की बात को विषय बनाकर सरलता और सहजता से बच्चों में ज्ञान को प्रेषित करने का कार्य करते हैं-जैसे, दादाजी बब्बू जी से पूछते हैं, अच्छा बताएँ कितने पैर होते हैं किताब के ? हम इंसानों की तरह दो या जानवरों की तरह चार या कीड़ों की तरह आठ, बारह या ज्यादा? इतनी गिनती तो आप को आती ही है।
इस प्रकार इस कहानी में संवादों के माध्यम से प्रश्नोत्तर द्वारा ज्ञान को सहजता से अनुप्राणित करने का कार्य किया गया है। विषय की नवीनता लिए यह कहानी 'चाबी कहाँ चली गई', 'अखबार कहाँ चला गया', 'चश्मा कहाँ चला गया' इत्यादि शब्दों के लिंग, वाक्यों की बनावट और सामान्य अशुद्धियों की ओर ध्यान आकर्षित करती है।
निष्कर्षतः जीवन की विलुप्त होती सरलता-सहजता को बनाए रखने के लिए पशु-पक्षियों, जानवरों के साथ मित्र-संवाद हों या पुरातन मान्यताओं की आधुनिक संदर्भों में व्याख्या, निर्जीव वस्तुओं की आवाज हो या प्रचलित मान्यताओं का घटाटोप, लेखक अपने अनुभव की परिपक्वता से बालकों की सोच और चरित्र को ऊँचा उठाने के लिए पात्रों को नवीन दृष्टि से सृजित करने का लक्ष्य रखते हैं।
इस संग्रह में लोक परंपरा से उठाए गए विषय साधारण अवश्य प्रतीत होते हैं, लेकिन नए रूप में इनका संदेश कहानियों को प्रासंगिकता से समाविष्ट करने के साथ-साथ शाश्वत शक्तियों में आस्था व्यक्त करता है। इसके अतिरिक्त इस संग्रह की अधिकांश कहानियाँ बताती हैं कि, अहंकार से परे कर्मशील बनकर दूसरों के लिए जीवन जीने की प्रक्रिया में ही सत्य का क्रियात्मक रूप विकसित होता है, जिससे गुजरते हुए ईमानदारी, सामूहिकता, प्रेम, विश्वास जैसे मूल्यों से व्यक्तित्व की पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है।
- डॉ. नवज्योत भनोत
DR.Navjot Bhanot : Short Biography in Hindi
डॉ. नवज्योत भनोत, डॉ. भीमराव अंबेडकर राजकीय महाविद्यालय, श्रीगंगानगर, राजस्थान के हिंदी विभाग में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं। यह एक प्रख्यात शिक्षाविद, शोधकर्ता, कर्वायत्री और आलोचक हैं। उन्होंने हिंदी, पंजाबी आर राजस्थानी में लेखन, अनुवाद और संपादन कार्य किया है। उनके द्वारा संपादित त्रैमासिक शोध पत्रिकाओं में 'अलख' ओर 'सृजन कुंज' शामिल हैं। लगभग एक दर्जन शोधार्थियों ने उनके निर्देशन में पीएच.डी. पूरी की है। एक रचनात्मक लेखिका होने के अलावा, वह प्रकृति-प्रेमी और पक्षी-दर्शक हैं। उन्हें यात्रा, फोटोग्राफी और कोलाज बनाने का शोक है। उन्हें उनके साहित्यिक प्रयासों के लिए विभिन्न संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है, जिसमें "सलिला साहित्य रत्न सम्मान, सलूंवर', 'हिंदी साहित्य मनीषी सम्मान, नाथद्वारा' 'भानु साहित्य सम्मान', भानु प्रतिष्ठान, काठमांडू, नेपाल, भारत थाई गौरव सम्मान, थाईलैंड एवम् नेपाल साहित्य रत्न शामिल हैं। पता ई-41 अंबिका सिटी, पदमपुर रोड, श्रीगंगानगर (राजस्थान)
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