Rani Durgavati Par Kavita : दुर्गावती रण में निकलीं

Dr. Mulla Adam Ali
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Hindi Children's Poem on Rani Durgavati by Prabhudayal Shrivastava, Bharat Ki Mahan Virangana Durgavati, Poetry on Indian Woman Warrior Rani Durgawati Par Kavita.

Poem on Rani Durgavati

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Bal Kavita In Hindi : मुट्ठी में है लाल गुलाल (बाल कविता संग्रह) से प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल कविता पढ़िए गोंडवाना साम्राज्य का गौरवशाली इतिहास और रानी दुर्गावती का समर्पण की कविता वीरांगना दुर्गावती रण में निकलीं। महान भारतीय वीरांगना दुर्गावती पर विशेष कविता, पढ़े वीरांगना रानी दुर्गावती की बहादुरी की कविता और साझा करें।

Mahan Virangana Durgavati

दुर्गावती रण में निकलीं


जब दुर्गावती रण में निकली,

हाथों में थीं तलवारें दो।

हाथों में थीं तलवारें दो,

हाथों में थीं तलवारें दो।

जब दुर्गावती रण में निकली,

हाथों में थीं तलवारें दो।


धीर-वीर वह नारी थी,

गढ़मंडल की वह रानी थी।

दूर-दूर तक थी प्रसिद्ध,

सबकी जानी-पहचानी थी।

उसकी ख्याती से घबराकर,

मुगलों ने हमला बोल दिया।

विधवा रानी के जीवन में,

बैठे ठाले विष घोल दिया।

मुगलों की थी यह चाल कि अब,

कैसे रानी को मारें वो।

जब दुर्गावती रण में निकलीं,

हाथों में थीं तलवारें दो।


सैनिक वेश धरे रानी,

हाथी पर चढ़ बल खाती थी।

दुश्मन को गाजर मूली-सा,

काटे, आगे बढ़ जाती थी।

तलवार चमकती अंबर में,

दुश्मन का सिर नीचे गिरता।

स्वामी भक्त हाथी उनका,

धरती पर था उड़ता-फिरता।

लप-लप तलवार चलाती थी,

पल-पल भरती हुंकारें वो।

जब दुर्गावती रण में निकली,

हाथों में थी तलवारें दो।


जहाँ-जहाँ जाती रानी,

बिजली-सी चमक दिखाती थी।

मुगलों की सेना मरती थी,

पीछे को हटती जाती थी।

दोनों हाथों वह रणचंडी,

कसकर तलवार चलाती थी।

दुश्मन की सेना पर पिलकर,

घनघोर कहर बरपाती थी।

झन-झन, ढन-ढन बज उठती थी,

तलवारों की झंकारें वो।

जब दुर्गावती रण में निकली,

हाथों में थी तलवारें दो।


पर रानी कैसे बढ़ पाती,

उसकी सेना तो थोड़ी थी।

मुगलों की सेना थी अपार,

रानी ने आस न छोडी थी।

पर हाय राज्य का भाग्य बुरा,

बेईमानी की घर वालों ने।

उनको शहीद करवा डाला,

उनके ही मंसबदारों ने।

कितनी पवित्र उनके तन से,

थीं गिरी बूँद की धारें दो।

जब दुर्गावती रण में निकलीं,

हाथों में थी तलवारें दो।


रानी तू दुनिया छोड़ गई,

पर तेरा नाम अमर अब तक।

और रहेगा नाम सदा,

सूरज चंदा नभ में जब तक।

हे देवी तेरी वीर गति,

पर श्रद्धा सुमन चढ़ाते हैं।

तेरी अमर कथा सुनकर,

दृग में आँसू आ जाते हैं।

है भारत माता से बिनती,

कष्टों से सदा उबारें वो।

जब दुर्गावती रण में निकली,

हाथों में थीं तलवारें दो।


नारी की शक्ति है अपार,

वह तो संसार रवाती है।

माँ पत्नी और बहन बनती,

वह जग जननी कहलाती है।

बेटी बनकर घर आँगन में,

हँसती खुशियाँ बिखराती है।

पालन-पोषण सेवा-भक्ति,

सबका दायित्व निभाती है।

आ जाए अगर मौका कोई तो,

दुश्मन को ललकारे वो।

जब दुर्गावती रण में निकलीं,

हाथों में थीं तलवारें दो।


- प्रभुदयाल श्रीवास्तव

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